बना दी ग़ज़ल

दादाजी की कलम से✌🏼

द्विजदेव की कलम से

जमाने ने कर दी जवानी से छल,

जिसे शायरों ने बना दी ग़ज़ल।

पहली दफ़ा हम दोनों जब मिले थे,

अनेकों थे शिकवे, हजारों गिले थे,

भुला भी न पाता मिलन के वो पल,

जिसे शायरों ने बना दी ग़ज़ल।

बड़ी ही कठिन है मुहब्बत की राहें,

दिवाने पै रहती है सबकी निगाहें,

मैं चलता हूॅ आगे, तू पीछे से चल,

जिसे शायरों ने बना दी ग़ज़ल।

चारों तरफ इश्क की सौदेबाजी,

चाहत में हर ओर हाॅजी ओ नाजी,

कोई लूट रहा है, किसी की कतल,

जिसे शायरों ने बना दी ग़ज़ल।

मेरी जान पलकें झुका मुस्करा दे,

उल्फ़त की नग़में कोई गुनगुना दे,

तो ‘द्विजदेव’ का जाए तबीयत बहल,

जिसे शायरों ने बना दी ग़ज़ल।

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कैसे नववर्ष मनाऊॅ

दादाजी की कलम से✌🏼

द्विजदेव की कलम से

कैसे नववर्ष मनाऊॅ?

मैं किसको व्यथा सुनाऊॅ?

खामोश क्षितिज असहाय,

खामोश हैं सभी दिशायें,

मदिरा का सिन्धु बहाऊॅ या

निर्मल जल जन को पिलाऊॅ?

कैसे नववर्ष मनाऊॅ?

मैं किसको व्यथा सुनाऊॅ?

वसुधा यों बेहाल बनी है,

सदाचार कंगाल बनी है,

आदमी आदमखोर हो गये,

चिंता की यह बात बनी है।

दिलजले को गले लगाऊॅ या

नफरत से हाथ मिलाऊॅ?

कैसे नववर्ष मनाऊॅ?

मैं किसको व्यथा सुनाऊॅ?

हर चौराहें मदिरा पहुॅची,

पग-पग खड़े लफंगा,

भयाक्रांत हैं हर बालाएॅ,

अस्मत का क्या खेल है नंगा!

तरस खा रही हर महिलाएॅ,

किससे दिल का दर्द सुनाएॅ?

एक ओर खंदक एक ओर खाई,

चोर-चोर मौसेरा भाई,

माॅ-बेटी यह सोच निकलती,

दामन कैसे बचाऊॅ?

कैसे नववर्ष मनाऊॅ?

मैं किसको व्यथा सुनाऊॅ?

पूत सपूत कपूत हुये,

पत्नी के पीछे भूत हुये।

जब दुर्दिन आते हैं,

अपने, बेगाने बन जाते हैं,

विपरीत हवा जीवन-पथ में

विकराल रूप दिखलाते हैं।

दुनिया की बदली आव-हवा

नित नई बीमारी, नई…

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नया बिहार बनाएॅ

दादाजी की कलम से✌🏼

द्विजदेव की कलम से

होली का त्योहार मनाएॅ,

आओ नया बिहार बनाएॅ।

सद्भाव, स्नेह ओ भाईचारा,

रंगों का यह पर्व है न्यारा,

श्रद्धा-प्रेम का अबीर उड़ाएॅ,

आओ नया बिहार बनाएॅ।

ऊॅच-नीच का भाव मिटाएॅ,

हम सब मिल-जुल होली गाएॅ,

ना कोई अपना, न कोई पराया,

सब ग्रंथों ने पाठ पढाया,

सब मानव हम भाई-भाई,

काहे को झगड़ा काहे लड़ाई,

उपेक्षित जन को गले लगाएॅ,

आओ नया बिहार बनाएॅ।

छोड़े दारु और शराब, क्यों करते जीवन बर्बाद

नये राग नव डफ-करताल, नये जोगीरा नव-नव ताल।

‘द्विजदेव’ नव साज सजाएॅ,

आओ नया बिहार बनाएॅ।

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शिवहर की माटी

दादाजी की कलम से✌🏼

द्विजदेव की कलम से

हर हीं शिव,

शिव हीं हर, सच हीं,

शिवहर है।

आकर्षण शिवहर का,

शिवहर दर्शन है।

जलता रहे अमर ज्योति यह,

स्वर्णिम दीप की बाती,

साक्षी है इतिहास ए है,

ठाकुर नवाब की थाती,

सबसे सुन्दर इस बिहार में,

शिवहर की है माटी।

एक नहीं, अनेकों ने दी थी अपनी कुर्बानी

नया सोच था, नई उमंगे, यौवन मस्त रवानी,

सबसे सुन्दर इस बिहार में,

शिवहर की है माटी।

सदियों से आदर्श हमारा,

बागमती की पावन धारा,

सादगी औ सुन्दरता में,

शिवहर राजा से सब हारा।

बाबा भुवनेश्वर नाथ का मंदिर,

देकुली धाम है देवघर भाॅति,

सबसे सुन्दर इस बिहार में,

शिवहर की है माटी।

शिवहर, पिपराही, पुरनहिया,

डुमरी औ तरियानी,

पाॅच प्रखंड पै जिला बना के झाजी,

रच दी एक नई कहानी।

गिरजानन्दन, रामदुलारी,

हरिकिशोर सा नेता,

राजनीति के क्षेत्र में तीनों,

एक-से-एक विजेता।

शिवहर की धरती बिहार में,

अपनी राह बनाई,

नाम किया रौशन शिवहर का,

श्रद्धा-स्नेह की दीप…

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बिन सद्गुरु

दादाजी की कलम से✌🏼

द्विजदेव की कलम से

बिन सद्गुरु मन के मंदिर में,

जीवन-दीप जले कैसे?

नाम सुमरि ले प्रभु का प्राणी,

नर-तन शाम ढले जैसे।

बिन सद्गुरु…

तन सुन्दर मन सुन्दर काया,

सब है प्रभु की माया,

यह तन बार-बार नहीं मिलना,

वेद-श्रुति है गाया।

तन पाकर करते मनमानी,

अभिमानी मूरख जैसे।

बिन सद्गुरु…

तोड़ दे बंदे झूठे फंदे,

हरि के ही गुण गा ले,

लूट रहे हैं तेरे घर को,

घर के ही रखवाले।

‘द्विजदेव’ जीते हो जग में,

क्यों जीवन जैसे-तैसे?

नाम सुमरि ले प्रभु का प्राणी,

नर-तन शाम ढले जैसे।

बिन सद्गुरु…

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मिट्टी बिहार की

दादाजी की कलम से✌🏼

द्विजदेव की कलम से

उर्वर है मिट्टी बिहार की,

कर्मभूमि हर गाँव है,

लग्नशील हर नौजवान,

मेहनतकश सभी किसान है।

झूम रही गेहूँ की बाली,

विहंस रहा फूलों की डार,

गमक रही आमों की मंजरी,

मस्त बसंती बहे बयार।

बिखेरते जहाँ सुबह शाम,

अनुराग खेत-खलिहान है,

लग्नशील हर नौजवान,

मेहनतकश सभी किसान है।

सच ही नहीं है खनिज-सम्पदा,

एक-से-एक नदियाँ विकराल,

प्रतिवर्ष अरबों की संपत्ति,

समा जाती कालों की गाल।

मेहनत कर सोना उपजायें,

यहीं दिल में अरमान है,

लग्नशील हर नौजवान,

मेहनतकश सभी किसान है।

छात्र हमारा मेधावी,

कर्तव्यनिष्ठ मज़दूर है,

भारत का शिरमौर बनेंगे,

वह दिन अब नहीं दूर है।

गुरु गोविंद गौतम की धरती,

का हमको अभिमान है,

लग्नशील हर नौजवान,

मेहनतकश सभी किसान है।

दिनकर, रेणु, बेनीपुरी की,

कौन बताये परिभाषा,

राहुल संकृत्यान, शास्त्री से,

गर्वित है हिन्दी भाषा।

दे प्रथम राष्ट्र को राष्ट्रपति,

गौरव बिहार ने पाया है,

जयप्रकाश की त्याग-तपस्या,

देश न अभी भुलाया है।

अनुकरणीय सभ्यता-संस्कृति,

आदरणीय…

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ग़म की दुनिया

दादाजी की कलम से✌🏼

द्विजदेव की कलम से

क्या बताऊॅ अजब दास्तां है,

ग़म की दुनिया ग़ज़ब वास्ता है।

भूख से बच्चे रोते-चिल्लाते कहीं,

मुट्ठी भर भी चबेना है पाते नहीं,

माँ की अश्रु करुणमय कहानी है ए,

दर्दमय ज़िन्दगी की निशानी है ए,

बस पलक मारते गोद सूना हुआ,

आह में उम्र भर सिर्फ़ रोना हुआ,

मिल न पाते कफ़न, हो न पाता दफ़न,

इन गरीबी वतन का है उजड़ा चमन,

ऐसे रंगीन युग का नज़ारा यहीं,

वैसे दुखियों का कोई सहारा नहीं,

इन्सां क्यों कर बना राज़ क्या है,

ग़म की…

है कहीं अन्न जकड़े हुए सड़ रहे,

भूखे जन एक दाने लिए लड़ रहे,

कुत्ते को दूध-रोटी सुहाता नहीं,

वो तो हलुवा-कचौड़ी भी खाता नहीं,

उन अमीरों का हर रात हर पल जवां,

बस सुरा सुंदरी का अनोखा समाँ,

वे क्या जाने गरीबी है कहते किसे,

हर घड़ी मौत मुँह बाये घेरे जिसे,

वो तो बैठे महल को सजाए हुए,

चाँदनी में दिवाली मनाए हुए,

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