ख़त

मेरे प्यारे भगवान्, मेरे निराले भगवान्।
मेरी तमाम खुशियों के लिए शुक्रिया।

हाँ, आप ही को ख़त लिख रहा हूँ। कुछ कहना है आपसे। क्यों कह रहा हूँ, जानते हैं? मैंने यह महसूस किया है कि जब दर्द को शब्द का लिबास मिल जाता है, तो वह थोड़ा कम हो जाता है। मैं जानता हूँ कि मैं जो कहने जा रहा हूँ, उसे लफ़्ज़ों की बेड़ियों में बाँध पाना संभव नहीं है। पर इस नाकाम कोशिश में ही शायद दिल और आँखों के बीच में भटके आँसू को राह मिल जाए।
कभी-कभी हमारे साथ ऐसी घटनाएँ घटित हो जाती हैं कि दिमाग़ चक्करघिन्नी बनकर रह जाता है। दरअसल यह बात है कुछ महीने पहले की। शिवदासपुर रेड लाईट एरिया की गलियों में गया था। उन गहरी, संकरी गलियों में, जहाँ कोई जाना तक नहीं चाहता। वाराणसी की पावन सभ्यता वाले समाज के बीच वहाँ बसती है एक अलग दुनिया। महिलाओं के देह व्यापार करनेवाले उस इलाक़े की पहचान इतनी बदनाम है कि उसका नाम लेने पर ही हर कोई मुँह सिकोड़ने लगता है।
वहाँ एक अलग दुनिया देखने को मिली। चमकदार रंगों और उनकी दीप्ति से अपनी ओर खींचने (या दूर भगाने?) का प्रयास करती एक अजीब दुनिया। सड़क के किनारे-किनारे हर घर के सामने सज-धजकर बैठी थीं, अपनी आत्मा को बेच चुकी औरतें। किसी आवारा बयार के इंतज़ार में। मुझे वे सारी रंगरेलियां खोखली नज़र आ रही थीं। नज़र आ रहे थे तो सिर्फ़ सूखे हुए होंठ, बोझिल आँखे और बुझे हुए चेहरे। भरपूर बेजान सी दुनिया के ऊपर उमस भरी दुपहरी में भूले-भटके हवा के झोंके को तरसती गुंधी-गुंधाई माटी की महक मुझे काटने को दौड़ रही थी। शायद वह सब मेरे दिमाग़ में घूम रहे सवालों की आँधी का परिणाम था। ओवरथिंकिंग की सारी दीवारें क्राॅस हो रही थीं। सवालों का मजूमा उछल-उछलकर मेरे दिमाग़ की नसों को ब्लॉक कर रहा था। मैं खुद को बहुत कमज़ोर पा रहा था। शायद मुझमें इतनी शक्ति नहीं कि उन वेदनाओं को समेट पाता।
थोड़ी देर में हम सब गुड़िया संस्था के भीतर पहुँच चुके थे। हमें देखते ही उन बच्चों के होठों से मुस्कान और आँखों से रोशनी छलकी। हाँ, मैं तो पहली बार गया था। लेकिन कुछ भैया बहुत पहले से जाते थे। दरअसल गुड़िया संस्था उस रेड लाईट एरिया के बच्चों को एक नया जीवन देने का एक सफल प्रयास है। हर शनिवार हमारे आई.आई.टी. (बी.एच.यू) के सहयोग क्लब के लोग उन मासूम बच्चों की मायूस ज़िंदगी में खुदा की रहमतों का पैग़ाम लेकर जाते हैं। हम सब मिलकर उन अँधेरी, बदनाम गलियों में उजाला फैलाने की कोशिश कर रहे हैं। यौनकर्मियों के बेटे-बेटियों को जीने का नया ज़रिया सिखाया जा रहा है।

कैलाश कल्पित के शब्दों में,
तृप्ति प्राप्ति में नहीं, विसर्जन-
की प्रज्ञा पर सम्भावित है
स्थिति कुछ भी नहीं, ग्राह्यता-
के सरगम पर आधारित है।

हमारी कोशिश किसी बच्चे की नई कलम हो जाए, यही हमारे लिए सच्चा हासिल होगा।
बच्चे बहुत खुश नज़र आ रहे थे। अपने घर की अहसासों की पहुँच से बाहर। अपने हिस्से की ज़िंदगी की तलाश में। उनकी निश्छल और निष्पाप हँसी को देखने का आनंद अलौकिक था।
खुली हवा पाकर तह करके रखे हुए मेरे जीवन के पुराने पृष्ठ सहसा फड़फड़ाने लगे। यादों की ड्योढि पर मेरी जो सबसे प्यारी वस्तु छूट गई, वो है मेरा बचपन।

स्वर्ग से सुन्दर, सपनों से प्यारा, था अपना घरद्वार।

उदास पलों में ताज़गी की हवा हैं मेरी यादें, मेरी जड़ें। और उनके लिए? हम कितने खुशनसीब हैं!
ये मासूम बच्चे इस अभागी दुनिया में क्यों आ गये? अब आ गये, तो जीते कैसे होंगे? उनकी ऐसी स्थिति क्यों है? उस घर में जन्म लेने की एकमात्र घटना ने मानो पूर्णविराम लगा दिया हो उनके हर ख़्वाब पर। फिर इस क्यों की तरह ही एक बेमानी-सा अल्फ़ाज़, किसे परवाह? आख़िर क्यों नहीं है उनकी परवाह? आख़िर क्यों नहीं है हर जगह गुड़िया संस्था और सहयोग क्लब के जैसे लोग? कितना अच्छा काम कर रहे हैं ये लोग! यथार्थ के कठोर धरातल पर विसंगतियों और विद्रुपताओं के बीच ख़्वाबों की एक दुनिया रच रहे हैं ये लोग। अपने गुणों की सुगंध चतुर्दिश फैला रहे हैं। बगैर किसी स्वार्थ के। निश्चित रूप से इनके प्रयासों से उन रेंगती हुई निर्दोष ज़िन्दगियों ने घुटनों से घिसटना शुरु कर दिया है। पाँव-पाँव चलते हुए एक दिन दौड़ भी लगाएंगे वे। एक दिन रचेंगे वे अपना आकाश। टाँक देंगे अपना सूरज। फिर इस बेशर्म ज़माने की फूहड़ हँसी और ठहाके धरी-की-धरी रह जाएंगी।
हमें सीख लेनी चाहिए ऐसी संस्थाओं से। हमलोग अपना कितना ही समय बतरस का आनंद लेने में और बहुत सारी अन्य गैर-जरूरी बातों में बीता देते हैं। थोड़ी देर के लिए यदि हम अपनी मोबाइल से झाँक रही बातूनी खिड़की को बंद करें और धूप की मेड़ पर छाँव के बीज बोने का प्रयास करें, तो हम सोच भी नहीं सकते हैं कि कितना बड़ा परिवर्तन आ जाएगा। उन मासूमों की तरह देश के करोड़ों लोग इस समाज के शुष्क मन के बंद खिड़कियों की सलाखों पर आठों पहर बैठे रहते हैं और इंतज़ार करते रहते हैं उनके खुलने की। हमारे मन की सूख चुकी रेत के गीली होने की। क्या हमसे बहुत अधिक माँगा जा रहा है?

फिर हमलोगों को दो भागों में बाँट दिया गया। कुछ लोग नीचे कंप्यूटर सिखाने चले गये और हमलोगों को विज्ञान के कुछ एक्सपेरिमेंट दिखाने को कहा गया। उसके पहले मैं बहुत सारे विद्यालयों में भी जा चुका था, लेकिन वहाँ के बच्चों जैसी जिज्ञासा और उत्साह कहीं भी देखने को न मिला था। ख़ासकर एक लड़के ने हमारा ध्यान खींचा। बरकत अली नाम था उसका। सबसे तेज़, सबसे ज़्यादा जिज्ञासु था वह। एक तेज था उसमें, पर उसके साथ एक ऐसा दीन-हीन सा भाव भी जिसमें अपने वजूद के लिए कोई चेत न हो। क्या मैं यह निष्कर्ष जबरन ही थोप रहा था उसके व्यक्तित्व पर? कभी-कभी कैसी-कैसी बातें सोचने लगता हूँ मैं! पर सच कहूँ तो मैं अपने में था ही नहीं तब। फँसा हुआ था, विचारों के भँवर में। नयन कोरकों में कुछ बुलबुले ठिठक कर रह गये थे।
कमरे से बाहर निकला, तो मेरे दिमाग़ में एक अजीब सन्नाटा था। मौत सी ख़ामोश। मानो बड़ी ग़ौर से उस ज़हर आलूदा फ़िज़ा में तैर रहे दर्द के तराने सुनने की कोशिश कर रहा था।

बाज़ार में तेरी बेटियाँ,
बस थोड़ा सा प्यार चाहती है।
बा…ज़ा…र में ते…री बे…टि…याँ।

दिलकशी के नीलाम घर चिल्ला-चिल्लाकर पूछ रहे थे,”क्या कोई सुन रहा है इस ख़ामोशी को?”

निदा फ़ाज़ली ने लिखा है-
मुँह की बात सुने हर कोई दिल के दर्द को जाने कौन
आवाज़ों के बाज़ारों में ख़ामोशी पहचाने कौन

जब लौटने का वक्त आया, तो मेरा दिल जल रहा था। धुऍ से मन भरा जा रहा था। फेंफड़े सिकुड़ रहे थे। ज़बान हलक के नीचे उतर गई थी। गुमसुम था। एक थका-हारा लड़का वापस आ रहा था, घिसटता-पिसटता। सोच रहा था, “यहाँ कैसे आ गई ये औरतें? क़िस्मत ने शायद उनके सामने कोई रास्ता न छोड़ा होगा, वरना यहाँ खुद से कौन आएगी जहाँ एक हाथ से रोटी दी जाती है और दूसरे हाथ से इज़्ज़त नोची जाती है? कटी पतंग-सी होती है ज़िंदगी, हवा के थपेड़ेे न जाने कहाँ ले जाकर पटक देते हैं।”
कैसी होती है औरतों की ज़िंदगी! ‘डोर’ फिल्म की नायिका अंत में अपने ससुर से पूछती है, “किस मर्यादा की बात कर रहे हैं आप? जब चाहा इस्तेमाल किया, जब चाहे फेंक दिया और जब चाहे घर की मर्यादा बना दी?”
सड़क पर दौड़ती ऑटो जैसे-जैसे आगे बढ रही थी, मेरी यादें मुझे पीछे उन गलियों की ओर ले जा रही थी। एक के बाद एक चौराहे गुज़रते गए और उनकी कहानी मुझे झकझोरती गई। मेरी साँसें मुझे छोटी-छोटी कब्रें जान पड़ रही थी, जिसमें दफ़न थी वे सारी यादें। मैं अपनी उदासी से पूछ रहा था, “दो-तीन घंटों के इस पहचान को पीछे छोड़ देने की मज़बूरी से यह उदासी क्यों?”
अगले दिन मैं अचानक खुद को थोड़ा बड़ा और ज़िम्मेदार महसूस करने लगा था। मैंने इस सफर से चाहे और कुछ सीखा हो या नहीं, लेकिन अंदर-ही-अंदर यह प्रण ज़रुर ले लिया था कि साकेत कभी साकत न बनेगा। समाज के प्रति अपनी ज़िम्मेदारियों का एहसास हो गया था मुझे। उस दिन बाबा विश्वनाथ मंदिर गया। कहते हैं कि नंदी के कान में अपनी बात कह देने से मुराद जल्दी पूरी होती है। मैंने बहुत दिनों बाद नंदी के कान में कुछ कहा। मैंने कहा, “हे भगवान्, उन औरतों का तो जो हुआ, सो हुआ। अब उनकी दबी-कुचली सकुचाई और कुम्हलाई लेकिन जवान होती हुई बेटियों को बचा लो। उन नन्ही गुड़ियों के बदन को ही उनका वतन करार न दिया जाए। उनके जिस्म कभी बाज़ार बनकर न सजे। वे इन गुमनाम, बदनाम गलियों में सदा के लिए गुम न रह जाए। कृपया उनकी टूटी हुई ज़िंदगी को समेट दो। उन्हें वो मुस्कुराहट दे दो, जो वे भूल चुके हैं।”
आप तक बात पहुँच गई थी न?

आपका साकेत, जो आज अपने लिए कुछ नहीं माँग रहा।

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ख़्वाब की ऐसी-ऐसी


मेरा छोटा भाई सोनू कल मुझसे बार-बार मोहन के बारे में पूछ रहा था। वह जानना चाहता था कि हम दोनों दोस्तों की किश्तियाँ बिलकुल विपरीत क्यों चल रही हैं? मेरे यह बोलने पर कि वह भटक गया, अच्छा माहौल न मिला, सोनू बोलने लगा, ”यह तो कोई बात न हुई। कहानी में तो हमेशा कोई ख़ास बात होती है।” मेरे मन के भीतर भी एक कहानीकार बेचैन-सा करवटें ले रहा था। मेरे मानस-पटल पर मोहन की धुंधली खट्टी-मीठी स्मृतियाँ बिलकुल स्पष्ट नज़र आने लगी। सोचने लगा कि यदि सधी राह होती, सधा ख़्वाब होता, उफनती नदी-सा जज़्बात न होता तो आज शायद वह ज़िंदगी के इस मोड़ पर खड़ा न होता।
मोहन पहले ऐसा न था। बचपन में मुझे हमेशा यूँ ही लगता था कि उसका मन गंगा के ढाल-सा होगा। हमेशा साफ़, भरा और छलछलाता हुआ। चाहे कितना ही सूखा क्यों न आ जाए, पर मन में स्नेह का स्त्रोत हमेशा लबालब भरा हुआ रहेगा। लेकिन वक्त ने एक ऐसा गीत गाया कि वह अब गुनगुनाना भूल चुका है। आज उसके अंदर इतना टेढापन पैदा हो गया है कि उसकी नज़र में मोहब्बत मोहब्बत न रही, रिश्ते रिश्ते न रहे, जीवन जीवन न रहा। सबकुछ एक मज़ाक बनकर रह गया है। वह मनोविकारों का मानो एक गुलदस्ता बन गया है।
मुझमें और मोहन में सबसे बड़ा अंतर यह था कि मैं समय की दौड़ से कदम मिलाने में अपने ख़्वाब छोटे करता चला गया। मोहन मुझसे कहा करता, “तुम बहुत डरपोक हो जो तुमने अपने ख़्वाबों के अध-लिखे पन्ने फाड़कर फ्लश-आउट कर दिए। अरे भाई, कभी अपनी मन की बात सुनो, उसकी ताल-से-ताल मिलाओ, तो जीने का मज़ा कुछ और ही है।” लेकिन मैं उसकी बातों से सहमत न होता। शुरु से ही मैंने दिल की आवाज़ को इतना दबाया था कि वह तो कब का ख़ामोश हो गया था। मैं कहता, “यार, मैं नहीं जानता कि मैं सही हूँ या ग़लत। शायद जानना भी नहीं चाहता। मेरी ज़िंदगी का तो सीधा-सा फ़लसफ़ा है कि भॅवर से बचकर यदि कोई भटकती नाव किनारे पर लगी हो, तो उसे वही लगी रहनी देनी चाहिए। चमक-दमक के चकाचौंध में खुद को खो देना अच्छी बात नहीं है। हवा में ख़्वाबों के पंख लगाकर उड़ना ज़िन्दगी नहीं। ज़िन्दगी यथार्थ की माटी पर पनपती है, नए पौधे की तरह। गीली मिट्टी की तरह है वर्तमान। ख़्वाब देखने की बजाय अपना कर्म करो।” मोहन शिकायत करता, “यार, तुम भी न! एक बार बोलना शुरु करते हो तो बस नारियल की सूखी मूंज से जैसे गरम राख को जूठे पतीलों के काले तलों पर रगड़ते ही चले जाते हो।” मेरा चेहरा विहँस उठता।
हमारे बीच यह संवाद एक बार नहीं, बार-बार हुआ। लेकिन न वह बदला, न मैं। वह हक़ीक़त से दूर भागता रहा। ख़्वाब देखता रहा। हर मिट्टी के चंदन और हर बगिया के नंदन हो जाने का ख़्वाब। छलकती आँखों को वीणा थमाने का ख़्वाब, सिसकती साँसों को कोयल बनाने का ख़्वाब।
अंततः सारे ख़्वाब अविवाहित ही मर गये क्योंकि ख़्वाब देखने से हक़ीक़त बदलती नहीं, बस धुंधला जाती है और जब ख़्वाब के दरवाजे और खिड़कियाँ बंद करनी पड़ जाती है, तो बड़ा दुःख होता है। मिर्च से तेज़ लगता है जलेबी का चाँटा। जब बंद पड़े-पड़े ख़्वाबों में बड़े सोर पैदा हो जाते हैं, कुंठाऍ पनप जाती है तो जीना भी मुश्किल लगने लगता है। कई बार तो हक़ीक़त में मिल रहे दुःख जीवन की जिजीविषा से भी बड़े हो जाते हैं। हर राह, हर मोड़, हर घड़ी, हर पहर अजनबी बन जाते हैं। ज़िन्दगी एक सुलगता सफ़र बन जाती है।
नई उमर की चुनरी हो या कमरी फटी-पुरानी हो, मैं सबसे यही कहना चाहता हूँ कि यदि आपके मन की कुटिया में भी इठलाती हुई, बलखाती हुई, चुपचाप कहीं से कोई ख़्वाब आऍ तो उसमें खो न जाऍ क्योंकि आज नहीं तो कल, ये बादल बिखर जाएंगे।
मैं जानता हूँ कि सफ़र लंबा है और हक़ीक़त कड़वी है। ऐसे में कभी-कभी सच्चाईयों से नावाक़िफ़ रहना और बस परछाईयों से खुद को बहलाते रहने अच्छा लगता है। लेकिन हम अनजाने में चाँद की परछाईयों को पाने की तमन्ना में अपने अंदर की रौशनी के दीप बुझाते चले जाते हैं। ठीक उसी तरह जैसे अपने देश में कुछ अंग्रेजी पढे-लिखे लोग अपनी महान सांस्कृतिक विरासत को भुलाकर, अर्धनग्न रह कर, रिश्तों की अहमियत भुलाकर खुद को ज़्यादा आधुनिक, प्रगतिशील और सुसंस्कृत समझने लगते हैं। वे भूल जाते हैं कि दाँत जब अपनी जगह से हट जाता है, तब वह किसी काम का नहीं रहता। यदि आप मेरी बातों से सहमत नहीं हैं, तो एक बार खुद वर्तमान हालात पर गौर करें। जिस युवा पर जिम्मेदारी थी, देश को फर्श से उत्कर्ष तक पहुँचाने की, वे आज इस सामाजिक पारंपरिक परिवेश से ऊबकर क्यों बदकार बनकर भटक रहे हैं? संयुक्त परिवार क्यों लुप्त होते जा रहे हैं? आख़िर इतनी कुंठा का कारण क्या है? छायावादी प्रेम प्रगतिवाद की भट्टी से गुजरकर मांसलता के दौर में आ गया है। यह अच्छी बात है?
यार, समस्याओं की फ़ेहरिस्त बड़ी लंबी है। मैं पूछता हूँ अपने पददलित समाज से, मैं पूछता हूँ इस शोषित संस्कृति से कि क्या समाज के इसी नए अवतार की कल्पना और कामना हम करते हैं? मेरे रचनाकार के मन में जो बेचैनी पल रही थी, दिमाग पर जो दस्तकें लगातार पड़ रही थीं और जिरह जारी थी, उसमें अब आप सभी पाठको को सहभागी और सहयात्री बनाना चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ कि इसे पढने के बाद आप स्वयं अपने मन में रचनागत हो।
एक हसीन ख़्वाब और ढेर सारे ख़्याल, उनसे जुड़ी हमारी आशा, न पूरी होने का डर। आख़िर क्यों हम बस इन्हीं बातों में फँसकर रह जाते हैं? यदि अभी भी आपको इस ‘क्यों’ का जवाब नहीं मिला है तो जी, दुनिया में ऐसे बहुत-से ‘क्यों’ हैं जिनका हमारे पास कोई जवाब नहीं है।

एक नया विहान

हमारे आई.आई.टी.(बी.एच.यू.) के साहित्य सभा ने अपना ब्लॉग शुरु किया है। अब मेरी बहुत सारी रचनाएँ यहाँ भी मिलेंगी। यह भी मेरी ही कलम की उपज है।

The 🔥 Club

बड़ी खुशी की बात है कि साहित्य सभा, आई.आई.टी.(बी.एच.यू.) ने अपना यह ब्लाॅग शुरु किया है।

हिन्दी और अंग्रेज़ी भाषाओं में कहानी, कविता, निबंध, साहित्यिक आलोचना, फिल्म समीक्षा, संस्मरण, यात्रा-वृतांत, इत्यादि के रूप में हमारी रोचिभूषित रचनाओं का हर वक्त आपको इंतज़ार रहे, यही इस ब्लॉग का हासिल होगा।

आपको हमारी सभा के अजस्र-शब्द-वृष्टि-निरत सारे साहित्यिक बंधु अलग-अलग प्रकार की रचनाओं की सौग़ात देते रहेंगे। हमारी रचनाओं में कभी परंपराओं के बंधन में बंधे रहने का संदेश मिलेगा, तो कभी परंपराओं की होलिका भी जलेगी। सामाजिक बंधनों और समाज के तक़ाज़ों से अप्रभावित अपनी मनमर्जी के जीवन की झलक मिलेगी। कभी शारदा के सितार और विष्णु के शंख की मधुरता दिखेगी, रति की सूरत और स्वर्ग की झाँकी की सुंदरता दिखेगी, गंगा के पानी और सावित्री के दामन की पवित्रता दिखेगी, तो कभी सपनों के खंडहर के ऊपर बेबस, लाचार, भटकती, टूटती, रोती ज़िन्दगी। कभी माशूक़ा के दिल का कुंदन…

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धन्यवाद ज्ञापन

यह धन्यवाद ज्ञापन करना मेरा सौभाग्य है।

मैंने 24 फरवरी 2018 को अपनी पहली कहानी “दुर्दशा” पोस्ट किया था। इतने कम समय में इतने पाठकों तक पहुँच जाना निश्चित रूप से खुशी की बात है।

मैं आख़िर क्यों लिखता हूँ? लिखने की आदत, अपनी एक अलग पहचान बनाने की चाहत या किसी दिन वक्त बदलने की आशा? शायद कोई जवाब नहीं है, इसलिए लिखता हूँ।
दरअसल क्या लिखता हूँ-पता नहीं, क्यों लिखता हूँ-पता नहीं। बस हाथ चलते जाते हैं, वक्त बीतता जाता है और शब्द बुनता जाता है। किसी की प्रशंसा मिल गई, तो खुश हो जाता हूँ। किसी प्रतियोगिता में हार गया, तो अपना क्या जाता है!

लिखता हूँ यह देखकर कि यहाँ तो हर कोई लिखता है। तब मेरे अंदर एक प्रतिस्पर्धा जन्म लेती है। फिर मैं भी अपनी कला का ढोल पीटता हूँ ताकि लोगों के दिमाग में भर सकूँ ये बात कि यार, मैं भी एक लेखक हूँ।

मुझे पूर्ण विश्वास है कि आगे और अच्छी-अच्छी रचनाएँ आप सब साहित्यिक बंधुओं के सम्मुख पेश कर पाऊंगा।

बहुत-बहुत धन्यवाद!

दुर्दशा

(1)

सदियों से बेख़्वाब रही स्त्रियों की ठिठकी, सिमटी, मसली-सी बदहाल ज़िन्दगियों में अनहद दुःख रहे हैं। सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स की दीवारों पर बिखरी टिप्पणियों और शेयरिंग्स से यह खुद-ब-खुद ज़ाहिर है कि जल-जलकर बुझ जाना ही औरतों का इतिहास रहा है।

यह कहानी है दुःख, दर्द, पीड़ा, अन्याय, संघर्ष और विवशता के अथाह सागर में तैरती-डूबती आर्तनाद करती एक आम नारी शकुंतला की। शकुंतला की कहानी बेबस, लाचार नारी की मूक-वेदना के क्रंदन की कहानी है। विधि ने मानो आँसू में कलम डुबोकर उसकी कथा लिखी थी।

शकुंतला की शादी मनोज से हुई थी। शादी क्या हुई, बेचारी का तो सुख-चैन ही समाप्त हो गया। मायके में जो आँखें गाँवों की सड़कों की तरह शाम होते ही बंद हो जाया करती थी, वे अब देर रात तक खुली रहती थीं। सबके सोने के बाद सोती थी और सबसे पहले जागती थी। दिनभर बगैर किसी शिकायत के लगनपूर्वक सारे काम करती थी। लेकिन पता नहीं किस चीज़ की कमी थी कि दिनभर ताने, अपमान, अनादर और छीछालेदर सहना पड़ता था। नाजों से पली फूल जैसी बच्ची पर विपत्तियों का पहाड़ टूट पड़ा था। चुपके-चुपके रोती थी लेकिन अपनी कहानी किसी से न कहती थी। यह कोई अचानक हो रही नई घटना थोड़े ही न थी। बचपन से ही उसने अपने आस-पास की विवाहित औरतों को अपमान का घूँट पीते देखा था। शादी से पहले तो कई बार उसे समझाया भी गया था कि ससुराल में कैसे रहना चाहिए। “औरत बंधन में ही अच्छी लगती है। उसे अपनी परिवार की मर्यादा का ध्यान रखना पड़ता है। वह मर्द थोड़े ही न है कि जो मन में आए, करे।”

सास-ननद उठते गाली और बैठते व्यंग्य से बातें करती थीं। कभी-कभी शकुंतला सोचती कि ये लोग भी तो कभी बहू रही होंगी या बनेंगी। लेकिन कभी कुछ बोल नहीं पाती। होठों में सिसकियाँ दबा लिया करती थी।

दरअसल ननदों की हालत कत्लखाने में रखी गई उस बकरी की तरह होती है जो तब तक चिंता नहीं करती, जब तक उसके अपने मरने की बारी न आ जाए।

जैसे-तैसे शकुंतला के दिन कट रहे थे। सोचती कि आज नहीं तो कल, दुःख के बादल तो छँटेंगे ही। समय के पाँव तो कभी उल्टे, कभी सीधे पड़ते रहते हैं। इसी आशा के साथ वह खुद काँटों पर सोकर बाकियों के लिए फूलों की सेज सजाती रही।

(2)

शादी के तीन साल बीत गए थे। अभी तक एक बार भी मायके न जाने दिया गया था। दूरी भी अधिक थी। इन तीन सालों में मायके वालों से कभी मिलना भी न हुआ था। हमेशा कोई-न-कोई बहाना बनाकर मुलाक़ात टाल दी जाती थी। नहीं-नहीं, लेन-देन की कोई समस्या न थी। दहेज तो पूरा दिया गया था। सारी माँगें पूरी की गई थी। दूर-दूर के गाँवों में आज भी उस शादी को याद किया जाता है। कहीं कोई कसर नहीं छोड़ा गया था। लेकिन अपने समाज में ससुराल वालों को बेवजह परेशान करने में पता नहीं क्या आनंद मिलता है! मायके वाले भी मजबूर होते हैं।

उस दिन पूरे तीन साल के बाद शकुंतला का छोटा भाई शिवम आया। घर ले जाने आया था। बहन से मोबाइल पर बात हो चुकी थी। सास-ससुर को इस बात की जानकारी नहीं थी। मनोज किसी काम से बाहर गया हुआ था। जब शिवम आया, तो उसे बैठने को भी न कहा गया। शकुंतला घर के अंदर थी। भाई को अपमानित करके वापस भेज दिया गया। इतने पर भी गुस्सा शांत न हुआ तो शकुंतला को सुना-सुनाकर सब उसके घरवालों के विषय में उल्टी-सीधी बातें करने लगे। मनोज आया, तो उसे भी बातों में मिर्च-मसाला लगाकर भड़का दिया गया।

शकुंतला अपने कमरे में फूट-फूटकर रो रही थी। जिस दुलारे भाई को तीन साल से राखी नहीं बाँधा था, आज वह घर के द्वार से ही बिना मिले अपमानित होकर लौट गया था। कोमल गुड़िया अब सारी सामाजिक मान्यताओं और मर्यादाओं से परे जाकर रण चंडी बन जाना चाहती थी। सहनशक्ति का बाँध टूट चुका था। सशक्त प्रतिवाद करने का जुनून सवार था। सोचती, “स्त्रियों की इस दुर्दशा के लिए खुद स्त्री भी कम दोषी नहीं है। स्त्रियों के बीच में अपने हक़ के लिए, अपनी सम्मान की रक्षा के लिए आवाज उठाने की प्रवृत्ति नहीं है। हम इस बदहाली को ईश्वरीय देन समझते हुए अपनी नियति मान बैठे हैं। यदि अभी नहीं बोली, तो बात बढ़ती चली जाएगी। उनकी घर की इज़्ज़त है, तो क्या मेरे घर की कोई इज़्ज़त नहीं है?”

आख़िरकार उसने आज तक मिली सारी दुःखों को याद किया, हिम्मत जुटाया और जाकर एक साँस में सास से बोल दिया, “माँजी, चाहे मुझे मार दो। जला दो। लेकिन मेरे बाप-भाई के बारे में कुछ गलत न कहो।”

घर के सारे लोग वही बैठे थे। नर्म गालों पर पति का एक ज़ोरदार तमाचा पड़ा। घर में चुप्पी सर्दी की धुंध-सी फैल गई, फिर और थोड़ा गहरा गई। घर अपने आप में सिमट गया। सब कुछ ठहर-सा गया। आज पहली बार परिवार की दीपशिखा जो डगमगाई थी!

अब इस घटना के बाद तो चाँदनी भी धूप थी। ज़िन्दगी नर्क बन गई। जली-कटी सुनने की तो आदत-सी हो गई। होठों से हँसी, माथे से खुशी और आँखों से आँसू खत्म हो गये थे। न हँस पाती थी, न रो पाती थी। ज़िन्दगी मानो किसी मज़ार की शमा बन चुकी थी। किसी को चिंता न रहती कि खाती-पीती है या नहीं, अच्छी है या बीमार, दुःखी है या सुखी।

दरअसल अब सेज का सिन्दूर भी अपना न रहा था। सदा एक धार में चलने की कसम खाने वाली किश्तियाँ अब बिछड़ चुकी थीं। पति के श्रव्य-भवन की खिड़कियाँ उसके लिए बंद हो चुकी थीं। जिस्म तो नज़दीक थे पर दिलों में काफ़ी दूरियाँ आ गई थी। सास-ससुर-ननद की अप्रसन्नता की तो उसे विशेष चिंता न थी। पति की एक मृदु मुसकान के लिए, एक मीठी बात के लिए उसका हृदय तड़प कर रह जाता था। चमड़ी और रक्त का ही बना पति अब सिर्फ़ उसकी चमड़ी को नोचता, उससे खेलता और फिर छोड़ देता। नित्य अवहेलना, तिरस्कार, उपेक्षा, अपमान सहते-सहते उसका चित्त संसार से विरक्त होता जाता था। दिन घिसटता जा रहा था। ज़िन्दगी रेंग रही थी। हर दिन, हर पल।

शादी के पूर्व जिस प्यार के स्वप्न पलकों में झूमा करते थे, उनकी अकालमृत्यु हो गई थी। अब न तो वह मनोज के साँसों की सरगम, धड़कन की वीणा और सपनों की गीतांजली रही थी और ना ही मनोज अब उसके उपवन का हिरण, मानस का हंस।

(3)

छुट्टी का दिन था। घर के सारे लोग बाहर गये हुए थे। किसी ने साथ चलने को पूछा तक न था। शकुंतला अकेली चुपचाप बैठी थी। समूचा बदन बुखार से तप रहा था। मन कई प्रश्नों और विचारों से घिरा हुआ था। सोच रही थी, “मैं अभागन हूँ, त्याज्य हूँ, कलमुंही हूँ। सिर्फ़ इसीलिए न कि परवश हूँ?”

उसे अब किसी चीज़ की लालसा न रही थी। जो सीता सोने के एक हिरण को देखकर व्याकुल हो गई थी, वह राम की गैर-मौजूदगी में सोने की पूरी लंका को भी देखना तक पसंद नहीं करती थी।

शकुंतला अपनी बदहाली पर रो रही थी। बहारों की पालकी लुट चुकी थी। सारी आशाऍ-आकांक्षाऍ मर चुकी थीं। अब तो सपनों की लाशों को कफ़न से ढॅक कर सिर्फ़ किस्मत के दिखाए तमाशों को देखना रह गया था। बीच-बीच में वह अपनी मानस-पटल पर अंकित बचपन की धुंधली खट्टी-मीठी स्मृतियों को टटोल रही थी। “बचपन कितना प्यारा था! पत्थर में प्राण जगा दे, ऐसी बच्ची थी वह। तब और अब में कितना अंतर आ गया है! अब तो इस जग-नदियाँ में अपनी नाव खेना बड़ा मुश्किल हो गया है।”

दरअसल स्त्री के लिए बचपन सावन के धूप की तरह होती है। जितनी चीज़ धूप में सूखानी हो, सूखा लो। शादी के रूप मे बारिश आती है और सब नाश हो जाता है।

शकुंतला सोचती, “स्त्रियों के लिए घृणा, निन्दा, हिंसा, चांडाली क्रोध, अंतः सारशून्य अहंकार- क्या यही सब हमारे समाज के इतिहास की समग्र फल-श्रुति नहीं है?” अब तो वह स्वयं भी इन समस्याओं को झेल चुकी थी।

यदि आँसुओं के धागे से दिल के ज़ख्म सिले जा सकते, तो शकुंतला के सारे कष्ट उसी क्षण मिट गए होते। सोचते-सोचते, रोते-रोते अचानक वह भावविहीन हो गई। मस्तिष्क बधिर हो गया। सूना होता हुआ, शून्य हो गया। साँस थक कर हार गई थी। शकुंतला मर चुकी थी। साथ में वह मासूम बच्चा भी, जो उसके कोख में पल रहा था। कहते है न कि शबनम की बूँदों तक पर निर्दयी धूप की कड़ी नज़र होती है।

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मनोज की दूसरी शादी हो गई। एक दिन सास अपनी नई बहू से कह रही थी, “क्या महारानी जी, हमेशा आराम फरमाती रहोगी या कुछ काम भी करोगी? सपनों के हिंडोलों में मगन हो के झूलते रहने के लिए यहाँ नहीं आई हो। हाय राम, भगवान ने मेरी बेटी जैसी पहली बहू को इतनी जल्दी मुझसे छिन लिया!”

-साकेत बिहारी