ख़त

मेरे प्यारे भगवान्, मेरे निराले भगवान्।
मेरी तमाम खुशियों के लिए शुक्रिया।

हाँ, आप ही को ख़त लिख रहा हूँ। कुछ कहना है आपसे। क्यों कह रहा हूँ, जानते हैं? मैंने यह महसूस किया है कि जब दर्द को शब्द का लिबास मिल जाता है, तो वह थोड़ा कम हो जाता है। मैं जानता हूँ कि मैं जो कहने जा रहा हूँ, उसे लफ़्ज़ों की बेड़ियों में बाँध पाना संभव नहीं है। पर इस नाकाम कोशिश में ही शायद दिल और आँखों के बीच में भटके आँसू को राह मिल जाए।
कभी-कभी हमारे साथ ऐसी घटनाएँ घटित हो जाती हैं कि दिमाग़ चक्करघिन्नी बनकर रह जाता है। दरअसल यह बात है कुछ महीने पहले की। शिवदासपुर रेड लाईट एरिया की गलियों में गया था। उन गहरी, संकरी गलियों में, जहाँ कोई जाना तक नहीं चाहता। वाराणसी की पावन सभ्यता वाले समाज के बीच वहाँ बसती है एक अलग दुनिया। महिलाओं के देह व्यापार करनेवाले उस इलाक़े की पहचान इतनी बदनाम है कि उसका नाम लेने पर ही हर कोई मुँह सिकोड़ने लगता है।
वहाँ एक अलग दुनिया देखने को मिली। चमकदार रंगों और उनकी दीप्ति से अपनी ओर खींचने (या दूर भगाने?) का प्रयास करती एक अजीब दुनिया। सड़क के किनारे-किनारे हर घर के सामने सज-धजकर बैठी थीं, अपनी आत्मा को बेच चुकी औरतें। किसी आवारा बयार के इंतज़ार में। मुझे वे सारी रंगरेलियां खोखली नज़र आ रही थीं। नज़र आ रहे थे तो सिर्फ़ सूखे हुए होंठ, बोझिल आँखे और बुझे हुए चेहरे। भरपूर बेजान सी दुनिया के ऊपर उमस भरी दुपहरी में भूले-भटके हवा के झोंके को तरसती गुंधी-गुंधाई माटी की महक मुझे काटने को दौड़ रही थी। शायद वह सब मेरे दिमाग़ में घूम रहे सवालों की आँधी का परिणाम था। ओवरथिंकिंग की सारी दीवारें क्राॅस हो रही थीं। सवालों का मजूमा उछल-उछलकर मेरे दिमाग़ की नसों को ब्लॉक कर रहा था। मैं खुद को बहुत कमज़ोर पा रहा था। शायद मुझमें इतनी शक्ति नहीं कि उन वेदनाओं को समेट पाता।
थोड़ी देर में हम सब गुड़िया संस्था के भीतर पहुँच चुके थे। हमें देखते ही उन बच्चों के होठों से मुस्कान और आँखों से रोशनी छलकी। हाँ, मैं तो पहली बार गया था। लेकिन कुछ भैया बहुत पहले से जाते थे। दरअसल गुड़िया संस्था उस रेड लाईट एरिया के बच्चों को एक नया जीवन देने का एक सफल प्रयास है। हर शनिवार हमारे आई.आई.टी. (बी.एच.यू) के सहयोग क्लब के लोग उन मासूम बच्चों की मायूस ज़िंदगी में खुदा की रहमतों का पैग़ाम लेकर जाते हैं। हम सब मिलकर उन अँधेरी, बदनाम गलियों में उजाला फैलाने की कोशिश कर रहे हैं। यौनकर्मियों के बेटे-बेटियों को जीने का नया ज़रिया सिखाया जा रहा है।

कैलाश कल्पित के शब्दों में,
तृप्ति प्राप्ति में नहीं, विसर्जन-
की प्रज्ञा पर सम्भावित है
स्थिति कुछ भी नहीं, ग्राह्यता-
के सरगम पर आधारित है।

हमारी कोशिश किसी बच्चे की नई कलम हो जाए, यही हमारे लिए सच्चा हासिल होगा।
बच्चे बहुत खुश नज़र आ रहे थे। अपने घर की अहसासों की पहुँच से बाहर। अपने हिस्से की ज़िंदगी की तलाश में। उनकी निश्छल और निष्पाप हँसी को देखने का आनंद अलौकिक था।
खुली हवा पाकर तह करके रखे हुए मेरे जीवन के पुराने पृष्ठ सहसा फड़फड़ाने लगे। यादों की ड्योढि पर मेरी जो सबसे प्यारी वस्तु छूट गई, वो है मेरा बचपन।

स्वर्ग से सुन्दर, सपनों से प्यारा, था अपना घरद्वार।

उदास पलों में ताज़गी की हवा हैं मेरी यादें, मेरी जड़ें। और उनके लिए? हम कितने खुशनसीब हैं!
ये मासूम बच्चे इस अभागी दुनिया में क्यों आ गये? अब आ गये, तो जीते कैसे होंगे? उनकी ऐसी स्थिति क्यों है? उस घर में जन्म लेने की एकमात्र घटना ने मानो पूर्णविराम लगा दिया हो उनके हर ख़्वाब पर। फिर इस क्यों की तरह ही एक बेमानी-सा अल्फ़ाज़, किसे परवाह? आख़िर क्यों नहीं है उनकी परवाह? आख़िर क्यों नहीं है हर जगह गुड़िया संस्था और सहयोग क्लब के जैसे लोग? कितना अच्छा काम कर रहे हैं ये लोग! यथार्थ के कठोर धरातल पर विसंगतियों और विद्रुपताओं के बीच ख़्वाबों की एक दुनिया रच रहे हैं ये लोग। अपने गुणों की सुगंध चतुर्दिश फैला रहे हैं। बगैर किसी स्वार्थ के। निश्चित रूप से इनके प्रयासों से उन रेंगती हुई निर्दोष ज़िन्दगियों ने घुटनों से घिसटना शुरु कर दिया है। पाँव-पाँव चलते हुए एक दिन दौड़ भी लगाएंगे वे। एक दिन रचेंगे वे अपना आकाश। टाँक देंगे अपना सूरज। फिर इस बेशर्म ज़माने की फूहड़ हँसी और ठहाके धरी-की-धरी रह जाएंगी।
हमें सीख लेनी चाहिए ऐसी संस्थाओं से। हमलोग अपना कितना ही समय बतरस का आनंद लेने में और बहुत सारी अन्य गैर-जरूरी बातों में बीता देते हैं। थोड़ी देर के लिए यदि हम अपनी मोबाइल से झाँक रही बातूनी खिड़की को बंद करें और धूप की मेड़ पर छाँव के बीज बोने का प्रयास करें, तो हम सोच भी नहीं सकते हैं कि कितना बड़ा परिवर्तन आ जाएगा। उन मासूमों की तरह देश के करोड़ों लोग इस समाज के शुष्क मन के बंद खिड़कियों की सलाखों पर आठों पहर बैठे रहते हैं और इंतज़ार करते रहते हैं उनके खुलने की। हमारे मन की सूख चुकी रेत के गीली होने की। क्या हमसे बहुत अधिक माँगा जा रहा है?

फिर हमलोगों को दो भागों में बाँट दिया गया। कुछ लोग नीचे कंप्यूटर सिखाने चले गये और हमलोगों को विज्ञान के कुछ एक्सपेरिमेंट दिखाने को कहा गया। उसके पहले मैं बहुत सारे विद्यालयों में भी जा चुका था, लेकिन वहाँ के बच्चों जैसी जिज्ञासा और उत्साह कहीं भी देखने को न मिला था। ख़ासकर एक लड़के ने हमारा ध्यान खींचा। बरकत अली नाम था उसका। सबसे तेज़, सबसे ज़्यादा जिज्ञासु था वह। एक तेज था उसमें, पर उसके साथ एक ऐसा दीन-हीन सा भाव भी जिसमें अपने वजूद के लिए कोई चेत न हो। क्या मैं यह निष्कर्ष जबरन ही थोप रहा था उसके व्यक्तित्व पर? कभी-कभी कैसी-कैसी बातें सोचने लगता हूँ मैं! पर सच कहूँ तो मैं अपने में था ही नहीं तब। फँसा हुआ था, विचारों के भँवर में। नयन कोरकों में कुछ बुलबुले ठिठक कर रह गये थे।
कमरे से बाहर निकला, तो मेरे दिमाग़ में एक अजीब सन्नाटा था। मौत सी ख़ामोश। मानो बड़ी ग़ौर से उस ज़हर आलूदा फ़िज़ा में तैर रहे दर्द के तराने सुनने की कोशिश कर रहा था।

बाज़ार में तेरी बेटियाँ,
बस थोड़ा सा प्यार चाहती है।
बा…ज़ा…र में ते…री बे…टि…याँ।

दिलकशी के नीलाम घर चिल्ला-चिल्लाकर पूछ रहे थे,”क्या कोई सुन रहा है इस ख़ामोशी को?”

निदा फ़ाज़ली ने लिखा है-
मुँह की बात सुने हर कोई दिल के दर्द को जाने कौन
आवाज़ों के बाज़ारों में ख़ामोशी पहचाने कौन

जब लौटने का वक्त आया, तो मेरा दिल जल रहा था। धुऍ से मन भरा जा रहा था। फेंफड़े सिकुड़ रहे थे। ज़बान हलक के नीचे उतर गई थी। गुमसुम था। एक थका-हारा लड़का वापस आ रहा था, घिसटता-पिसटता। सोच रहा था, “यहाँ कैसे आ गई ये औरतें? क़िस्मत ने शायद उनके सामने कोई रास्ता न छोड़ा होगा, वरना यहाँ खुद से कौन आएगी जहाँ एक हाथ से रोटी दी जाती है और दूसरे हाथ से इज़्ज़त नोची जाती है? कटी पतंग-सी होती है ज़िंदगी, हवा के थपेड़ेे न जाने कहाँ ले जाकर पटक देते हैं।”
कैसी होती है औरतों की ज़िंदगी! ‘डोर’ फिल्म की नायिका अंत में अपने ससुर से पूछती है, “किस मर्यादा की बात कर रहे हैं आप? जब चाहा इस्तेमाल किया, जब चाहे फेंक दिया और जब चाहे घर की मर्यादा बना दी?”
सड़क पर दौड़ती ऑटो जैसे-जैसे आगे बढ रही थी, मेरी यादें मुझे पीछे उन गलियों की ओर ले जा रही थी। एक के बाद एक चौराहे गुज़रते गए और उनकी कहानी मुझे झकझोरती गई। मेरी साँसें मुझे छोटी-छोटी कब्रें जान पड़ रही थी, जिसमें दफ़न थी वे सारी यादें। मैं अपनी उदासी से पूछ रहा था, “दो-तीन घंटों के इस पहचान को पीछे छोड़ देने की मज़बूरी से यह उदासी क्यों?”
अगले दिन मैं अचानक खुद को थोड़ा बड़ा और ज़िम्मेदार महसूस करने लगा था। मैंने इस सफर से चाहे और कुछ सीखा हो या नहीं, लेकिन अंदर-ही-अंदर यह प्रण ज़रुर ले लिया था कि साकेत कभी साकत न बनेगा। समाज के प्रति अपनी ज़िम्मेदारियों का एहसास हो गया था मुझे। उस दिन बाबा विश्वनाथ मंदिर गया। कहते हैं कि नंदी के कान में अपनी बात कह देने से मुराद जल्दी पूरी होती है। मैंने बहुत दिनों बाद नंदी के कान में कुछ कहा। मैंने कहा, “हे भगवान्, उन औरतों का तो जो हुआ, सो हुआ। अब उनकी दबी-कुचली सकुचाई और कुम्हलाई लेकिन जवान होती हुई बेटियों को बचा लो। उन नन्ही गुड़ियों के बदन को ही उनका वतन करार न दिया जाए। उनके जिस्म कभी बाज़ार बनकर न सजे। वे इन गुमनाम, बदनाम गलियों में सदा के लिए गुम न रह जाए। कृपया उनकी टूटी हुई ज़िंदगी को समेट दो। उन्हें वो मुस्कुराहट दे दो, जो वे भूल चुके हैं।”
आप तक बात पहुँच गई थी न?

आपका साकेत, जो आज अपने लिए कुछ नहीं माँग रहा।

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