दुर्दशा — The 🔥 Club

तीन-चार महीने पहले एक कहानी लेखन प्रतियोगिता में इसे लिखा था। आज हमारे साहित्य सभा के ब्लॉग पर आई।✌🏼

(1) सदियों से बेख़्वाब रही स्त्रियों की ठिठकी, सिमटी, मसली-सी बदहाल ज़िन्दगियों में अनहद दुःख रहे हैं। सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स की दीवारों पर बिखरी टिप्पणियों और शेयरिंग्स से यह खुद-ब-खुद ज़ाहिर है कि जल-जलकर बुझ जाना ही औरतों का इतिहास रहा है। यह कहानी है दुःख, दर्द, पीड़ा, अन्याय, संघर्ष और विवशता के अथाह […]

via दुर्दशा — The 🔥 Club

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