पानी का रंग

पानी अनमोल है। जीवनदायी है। अनिवार्य है। सहारा है। लेकिन विचित्र है। विस्मयकारी है।

कभी-कभी तो मैं बेचैन होकर यह सोचने को विवश हो जाता हूँ कि पानी का रंग क्या है! लोग कहते हैं कि यह रंगहीन है। क्या वाकई यह रंगहीन है?

मुझे तो इस रंगहीन कहे जाने वाले पदार्थ में अनेक रंग नज़र आते हैं। भाँति-भाँति प्रकार के रंग। खुद में इंद्रधनुषी छटा समेटे पानी और इसका रंग मुझे बड़ा अनोखा प्रतीत होता है। मैं हमेशा इनसे कुछ सीखने का प्रयास करता हूँ और सौभाग्यवश कभी निराश नहीं होता। किंकर्तव्यविमूढ़ता के क्षणों में ये रंग ही मेरा मार्गदर्शन करते हैं।

आख़िर कैसे रंग?

पानी रे पानी तेरा रंग कैसा?

पानी में मुझे हरदम हरपल नए-नए रंग नज़र आते हैं। ये बदलते रहते हैं। ये हमें समय के साथ बदलते रहना सीखाते हैं। पानी भूखे-नंगों के लिए सबसे बड़ा सहारा है। संसार में नित करोड़ों लोग सिर्फ़ पानी पीकर सो जाते हैं। प्यास के पलों में हम इसकी एक बूंद के लिए कुछ भी न्योछावर करने को तैयार हो सकते हैं। यह सहारा है। अमूल्य है।

पानी रे पानी तेरा रंग कैसा?

भूखे की भूख और प्यास जैसा।

पानी जब गंगा से मिल जाता है तो यह गंगाजल अमृत बन जाता है। मानव जाति को मोक्ष का रास्ता दिखाता है। हम उसे अपने घरों में पवित्र अनुष्ठानों में प्रयोग करते हैं। शुद्ध होते हैं। यही पानी जब बादल से मिल जाता है, तो हमें रिमझिम बरस रहे सावन की सौगात देता है। उस वक्त यह बड़ा मनोहारी लगता है। मोर नाचने लगते हैं। फसल लहलहा उठते हैं। प्रेमी युगल भाव विभोर हो जाते हैं। समूचा संसार आनंद के सागर में गोता खाता प्रतीत होता है।

लेकिन यही पानी जब हमारी छतों से टपकता है, तो हमारा जीना हराम हो जाता है। हम इसे कोसने लगते हैं। यह जब बाढ के रूप में, सूनामी के रूप में हमारे सामने आता है, तो हम त्राहि-त्राहि करने लग जाते हैं। चहुँओर हाहाकार मच जाता है।

पानी रे पानी तेरा रंग कैसा?

दुनिया बनाने वाले रब जैसा!

पानी के न जाने कितने रूप हैं। कभी सहारा है, तो कभी आपदा। कभी जीवन देता है, तो कभी जीवन छिनता है। कभी खुशी देता है, तो कभी दुख। कभी अच्छा लगता है, तो कभी बुरा। कभी हम इसके बेहद करीब जाना चाहते हैं, तो कभी दूर भागते हैं।

हर क्षण मुझे यह नए रंग-रूप में दिखाई देता है। अदना-सा यह अबोध बालक तो कभी इसके रंग को नहीं समझ सकता। लेकिन इसके हर रंग को मैं एक नए उत्साह से देखता हूँ। समय और स्थान के साथ इसके बदलते रंग को देखकर चकित होता हूँ और सोचता हूँ कि मुझे भी ऐसा ही बनना चाहिए। कभी एक रंग में सीमित न रह जाना चाहिए। बदलाव को सहजता से स्वीकार करना चाहिए।

पानी रे पानी तेरा रंग कैसा?

जिसमें मिला दो लगे उस जैसा।

आखिर मैं पानी की तरह क्यों बनना चाहता हूँ? क्या समय के साथ बदलना जरूरी है? यदि हाँ, तो क्यों?

समय के साथ बदलते हुए मूल्यों के फलस्वरूप समाज और परिवार के जिस माहौल में हम रह रहे हैं, उस रोचक परिवेश में हमारा भी नित बदलते रहना समय की मांग है। जब बाल्यावस्था पार कर मैंने धीरे-धीरे कैशोर्य का स्पर्श किया, तो मुझे ये दुनिया अचानक कुछ अजनबी-सी लगने लगी। मैं परेशान हो गया। तब पानी के रंग ने मुझे चलते समय के साथ बदलना सीखाया। कभी-कभी जब उल्लास और उदासी की घटनाएँ अकस्मात घटित हो जाती है और मेरे मन में तरह-तरह के प्रश्न उठने लगते हैं, तो मैं उन सवालों का जवाब ढूंढे बगैर समय के साथ बदलना अधिक अच्छा समझता हूं।

दरअसल यह दुनिया बड़ी रोचक है। थोड़ी अजीब। समझ से परे।

यदि हम दुनिया के साथ नहीं बदलेंगे, तो दुनिया हमें पीछे छोड़कर अपने रास्ते पर निकल पड़ेगी। हमारा इंतज़ार नहीं करेगी। हम तन्हा हो जाएंगे और भाई, तन्हाई बड़ी ज़ालिम होती है।

दुनिया भाग रही है, लोग भाग रहे हैं, समय भाग रहा है। हमें भी भागना होगा, ताल-से-ताल मिलाए रखने के लिए। हमारे पास यह सोचने के लिए बिलकुल भी समय नहीं है कि हम क्यों भागे! क्यों बदले? बस बदलते रहना है, पानी की तरह। जिस परिवेश में हो, उसके अनुरूप ही चोला पहन लेना है। बगैर किसी झिझक के।

लेकिन क्या पानी का रंग सिर्फ़ माहौल के साथ बदलना सीखाता है? नहीं। यह हमें कुछ और भी सीखाता है, जो बेहद प्यारी है। सबसे महत्वपूर्ण है।

पानी जिस तरह से अनेक रंगों में होने के बावजूद अपनी रंगहीनता नहीं छोड़ता, वह हमें अपना धर्म बरकरार रखना सीखाता है। पवित्रता बनाए रखने का संदेश देता है।

हम समय, माहौल और उम्र के साथ चाहे कितने भी क्यों न बदल जाएँ, अपने ‘स्व’ को कभी नहीं खोना चाहिए। वही हमारी वास्तविक पहचान है। उसके बगैर हमारा कोई मोल नहीं है।

यह सच है कि ज़िंदगी के इस रोचक सफर में कभी-कभी हमें अपनी वास्तविक पहचान को भूलकर चाहे-अनचाहे थोड़ा बदलना पड़ता है, लेकिन वह बदलाव शाश्वत नहीं होनी चाहिए। हमारे अंदर का बचपना, हमारे गुण-दुर्गुण, हमारी पसंद-नापसंद, हमारे रिश्ते-नाते ही हमारी वास्तविक पहचान है। इन्हें गुमनामी के अंधेरे में धकेल देना कभी उचित नहीं होगा। हम इन बहुमूल्य बातों का मोल देकर बदलावों को स्वीकार नहीं कर सकते।

तो इस प्रकार रंगहीन पानी के अनंत रंग हमें समय के साथ बदलना और बदलावों के बावजूद अपनी वास्तविकता बरकरार रखना सीखाते हैं। संक्षेप में, यह हमें ज़िंदगी का फ़लसफ़ा सीखाता है। जीना सीखाता है। इस छद्मवेशी दुनिया को उसके ही रूप में स्वीकारना सीखाता है।

-साकेत बिहारी

Advertisements

13 thoughts on “पानी का रंग

  1. अद्भुत वर्णन ।
    पानी से ऐसी भी सीख ली जा सकती है,ऐसी कल्पना भी नहीं की थी मैंने।
    लिखते रहो।

    Liked by 1 person

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

w

Connecting to %s