बना दी ग़ज़ल

दादाजी की कलम से✌🏼

द्विजदेव की कलम से

जमाने ने कर दी जवानी से छल,

जिसे शायरों ने बना दी ग़ज़ल।

पहली दफ़ा हम दोनों जब मिले थे,

अनेकों थे शिकवे, हजारों गिले थे,

भुला भी न पाता मिलन के वो पल,

जिसे शायरों ने बना दी ग़ज़ल।

बड़ी ही कठिन है मुहब्बत की राहें,

दिवाने पै रहती है सबकी निगाहें,

मैं चलता हूॅ आगे, तू पीछे से चल,

जिसे शायरों ने बना दी ग़ज़ल।

चारों तरफ इश्क की सौदेबाजी,

चाहत में हर ओर हाॅजी ओ नाजी,

कोई लूट रहा है, किसी की कतल,

जिसे शायरों ने बना दी ग़ज़ल।

मेरी जान पलकें झुका मुस्करा दे,

उल्फ़त की नग़में कोई गुनगुना दे,

तो ‘द्विजदेव’ का जाए तबीयत बहल,

जिसे शायरों ने बना दी ग़ज़ल।

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20 thoughts on “बना दी ग़ज़ल

      1. Ha,ham bihar ke Gopalganj jeela ke chhote se ek gaanw me rehte hai…Aur chhoti moti kavitaye likhte rehte….

        Kabhi kabhi meri kavitao ko padh lijie…

        Liked by 2 people

  1. हेलो साकेत बिहारी
    यह एक अजीब संयोग है..बचपन में मेरे परम पूज्य दादाजी ने मेरा नामकरण संकेत बिहारी किया था और आपने अपने दादाजी की कविता आपने हमें पढ़ने हेतु उपलब्ध कराया..धन्यवाद।
    मैं राष्ट्रीयता व राष्ट्रीय सोच से जुड़ा जीव हूँ अतः हिंद-हिन्दी-हिंदुस्तानी पकृति,प्रवृत्ति-परिवेश-परंपरा व प्रगति प्रयास का परचम मैं विश्व में ही नहीं अपितु,ब्रह्मांड तक लहरता-फहरता देखने का शुभेक्छुक हूँ..जय भारत!

    Liked by 1 person

  2. आपके दादा जी ने बहुत ही खूबसूरत अल्फ़ाज प्रयोग किये है। हिन्दी लिखने का गुण आपको विरासत में मिला।सौभाग्यशाली हैं आप।बधाई।

    Liked by 1 person

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