पलायन

कोई आठ मंज़िल इमारत की छत पर
कोई शांत तन्हा है सागर किनारे
कहीं बंद कमरे में फाँसी का फंदा
तो सल्फास की कोई पुड़िया दबाये-
सभी ज़िन्दगी के सवालों में उलझे
न कुछ सोच पाने के क़ाबिल रहे हैं।

उन्हें याद आते हैं दिन वो पुराने
जब छोटी से छोटी किन्हीं मुश्किलों में
गर बेचैन होते, परेशान होते
सभी काम छोड़े तब माँ दौड़ी आती
फिर बातों ही बातों में बहना हँसाती
और फिर ज्यों ही पापा जब बाँहों में भरते
टहलने निकलते थे ऊँगली पकड़ के
सभी चिंता उलझन बड़ी तेज़ उड़कर
क्षितिज के गले लग पलों में छूमंतर-
कभी डगमगाये तो फिर सम्भले भी
बड़ी शान से ज़िन्दगी चल रही थी।

वो अब जब पलायन के रस्ते खड़े हैं
तो मुड़-मुड़ के देखें, निहारे; तलाशे-
फ़क़त एक कंधा, जहाँ सर वो रख के
सभी बात कह दें और जी भर के रो लें
कि कह दें कि वो कुछ अलग चाहते हैं
कि नासूर दिल के फफोले बने हैं
वो ना कर सके हैं कुछेक बात पूरी
तो डर लग रहा है सभी क्या कहेंगे
कि रस्ता कोई सूझता ही नहीं है
मगर आज ऐसा तो कोई नहीं है
जो बातों ही बातों में उनको हँसा दे…

बड़ी तेज़ भागी इस दुनिया के लोगों
कभी रोज़ मरते किसी एक तन्हा
से इंसां बेचारे जो घुट-घुट के जीते
जो महफ़िल में सबसे अलग हट के रहते
जहाँ ख़्वाब सारे कहीं खो चुके हैं
जहाँ ज़िन्दगी से सभी रंग उड़े हैं
उस इंसां बेचारे को कंधा दिये हो?

-साकेत बिहारी

बना दी ग़ज़ल

दादाजी की कलम से✌🏼

द्विजदेव की कलम से

जमाने ने कर दी जवानी से छल,

जिसे शायरों ने बना दी ग़ज़ल।

पहली दफ़ा हम दोनों जब मिले थे,

अनेकों थे शिकवे, हजारों गिले थे,

भुला भी न पाता मिलन के वो पल,

जिसे शायरों ने बना दी ग़ज़ल।

बड़ी ही कठिन है मुहब्बत की राहें,

दिवाने पै रहती है सबकी निगाहें,

मैं चलता हूॅ आगे, तू पीछे से चल,

जिसे शायरों ने बना दी ग़ज़ल।

चारों तरफ इश्क की सौदेबाजी,

चाहत में हर ओर हाॅजी ओ नाजी,

कोई लूट रहा है, किसी की कतल,

जिसे शायरों ने बना दी ग़ज़ल।

मेरी जान पलकें झुका मुस्करा दे,

उल्फ़त की नग़में कोई गुनगुना दे,

तो ‘द्विजदेव’ का जाए तबीयत बहल,

जिसे शायरों ने बना दी ग़ज़ल।

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कैसे नववर्ष मनाऊॅ

दादाजी की कलम से✌🏼

द्विजदेव की कलम से

कैसे नववर्ष मनाऊॅ?

मैं किसको व्यथा सुनाऊॅ?

खामोश क्षितिज असहाय,

खामोश हैं सभी दिशायें,

मदिरा का सिन्धु बहाऊॅ या

निर्मल जल जन को पिलाऊॅ?

कैसे नववर्ष मनाऊॅ?

मैं किसको व्यथा सुनाऊॅ?

वसुधा यों बेहाल बनी है,

सदाचार कंगाल बनी है,

आदमी आदमखोर हो गये,

चिंता की यह बात बनी है।

दिलजले को गले लगाऊॅ या

नफरत से हाथ मिलाऊॅ?

कैसे नववर्ष मनाऊॅ?

मैं किसको व्यथा सुनाऊॅ?

हर चौराहें मदिरा पहुॅची,

पग-पग खड़े लफंगा,

भयाक्रांत हैं हर बालाएॅ,

अस्मत का क्या खेल है नंगा!

तरस खा रही हर महिलाएॅ,

किससे दिल का दर्द सुनाएॅ?

एक ओर खंदक एक ओर खाई,

चोर-चोर मौसेरा भाई,

माॅ-बेटी यह सोच निकलती,

दामन कैसे बचाऊॅ?

कैसे नववर्ष मनाऊॅ?

मैं किसको व्यथा सुनाऊॅ?

पूत सपूत कपूत हुये,

पत्नी के पीछे भूत हुये।

जब दुर्दिन आते हैं,

अपने, बेगाने बन जाते हैं,

विपरीत हवा जीवन-पथ में

विकराल रूप दिखलाते हैं।

दुनिया की बदली आव-हवा

नित नई बीमारी, नई…

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नया बिहार बनाएॅ

दादाजी की कलम से✌🏼

द्विजदेव की कलम से

होली का त्योहार मनाएॅ,

आओ नया बिहार बनाएॅ।

सद्भाव, स्नेह ओ भाईचारा,

रंगों का यह पर्व है न्यारा,

श्रद्धा-प्रेम का अबीर उड़ाएॅ,

आओ नया बिहार बनाएॅ।

ऊॅच-नीच का भाव मिटाएॅ,

हम सब मिल-जुल होली गाएॅ,

ना कोई अपना, न कोई पराया,

सब ग्रंथों ने पाठ पढाया,

सब मानव हम भाई-भाई,

काहे को झगड़ा काहे लड़ाई,

उपेक्षित जन को गले लगाएॅ,

आओ नया बिहार बनाएॅ।

छोड़े दारु और शराब, क्यों करते जीवन बर्बाद

नये राग नव डफ-करताल, नये जोगीरा नव-नव ताल।

‘द्विजदेव’ नव साज सजाएॅ,

आओ नया बिहार बनाएॅ।

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शिवहर की माटी

दादाजी की कलम से✌🏼

द्विजदेव की कलम से

हर हीं शिव,

शिव हीं हर, सच हीं,

शिवहर है।

आकर्षण शिवहर का,

शिवहर दर्शन है।

जलता रहे अमर ज्योति यह,

स्वर्णिम दीप की बाती,

साक्षी है इतिहास ए है,

ठाकुर नवाब की थाती,

सबसे सुन्दर इस बिहार में,

शिवहर की है माटी।

एक नहीं, अनेकों ने दी थी अपनी कुर्बानी

नया सोच था, नई उमंगे, यौवन मस्त रवानी,

सबसे सुन्दर इस बिहार में,

शिवहर की है माटी।

सदियों से आदर्श हमारा,

बागमती की पावन धारा,

सादगी औ सुन्दरता में,

शिवहर राजा से सब हारा।

बाबा भुवनेश्वर नाथ का मंदिर,

देकुली धाम है देवघर भाॅति,

सबसे सुन्दर इस बिहार में,

शिवहर की है माटी।

शिवहर, पिपराही, पुरनहिया,

डुमरी औ तरियानी,

पाॅच प्रखंड पै जिला बना के झाजी,

रच दी एक नई कहानी।

गिरजानन्दन, रामदुलारी,

हरिकिशोर सा नेता,

राजनीति के क्षेत्र में तीनों,

एक-से-एक विजेता।

शिवहर की धरती बिहार में,

अपनी राह बनाई,

नाम किया रौशन शिवहर का,

श्रद्धा-स्नेह की दीप…

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बिन सद्गुरु

दादाजी की कलम से✌🏼

द्विजदेव की कलम से

बिन सद्गुरु मन के मंदिर में,

जीवन-दीप जले कैसे?

नाम सुमरि ले प्रभु का प्राणी,

नर-तन शाम ढले जैसे।

बिन सद्गुरु…

तन सुन्दर मन सुन्दर काया,

सब है प्रभु की माया,

यह तन बार-बार नहीं मिलना,

वेद-श्रुति है गाया।

तन पाकर करते मनमानी,

अभिमानी मूरख जैसे।

बिन सद्गुरु…

तोड़ दे बंदे झूठे फंदे,

हरि के ही गुण गा ले,

लूट रहे हैं तेरे घर को,

घर के ही रखवाले।

‘द्विजदेव’ जीते हो जग में,

क्यों जीवन जैसे-तैसे?

नाम सुमरि ले प्रभु का प्राणी,

नर-तन शाम ढले जैसे।

बिन सद्गुरु…

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मिट्टी बिहार की

दादाजी की कलम से✌🏼

द्विजदेव की कलम से

उर्वर है मिट्टी बिहार की,

कर्मभूमि हर गाँव है,

लग्नशील हर नौजवान,

मेहनतकश सभी किसान है।

झूम रही गेहूँ की बाली,

विहंस रहा फूलों की डार,

गमक रही आमों की मंजरी,

मस्त बसंती बहे बयार।

बिखेरते जहाँ सुबह शाम,

अनुराग खेत-खलिहान है,

लग्नशील हर नौजवान,

मेहनतकश सभी किसान है।

सच ही नहीं है खनिज-सम्पदा,

एक-से-एक नदियाँ विकराल,

प्रतिवर्ष अरबों की संपत्ति,

समा जाती कालों की गाल।

मेहनत कर सोना उपजायें,

यहीं दिल में अरमान है,

लग्नशील हर नौजवान,

मेहनतकश सभी किसान है।

छात्र हमारा मेधावी,

कर्तव्यनिष्ठ मज़दूर है,

भारत का शिरमौर बनेंगे,

वह दिन अब नहीं दूर है।

गुरु गोविंद गौतम की धरती,

का हमको अभिमान है,

लग्नशील हर नौजवान,

मेहनतकश सभी किसान है।

दिनकर, रेणु, बेनीपुरी की,

कौन बताये परिभाषा,

राहुल संकृत्यान, शास्त्री से,

गर्वित है हिन्दी भाषा।

दे प्रथम राष्ट्र को राष्ट्रपति,

गौरव बिहार ने पाया है,

जयप्रकाश की त्याग-तपस्या,

देश न अभी भुलाया है।

अनुकरणीय सभ्यता-संस्कृति,

आदरणीय…

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ग़म की दुनिया

दादाजी की कलम से✌🏼

द्विजदेव की कलम से

क्या बताऊॅ अजब दास्तां है,

ग़म की दुनिया ग़ज़ब वास्ता है।

भूख से बच्चे रोते-चिल्लाते कहीं,

मुट्ठी भर भी चबेना है पाते नहीं,

माँ की अश्रु करुणमय कहानी है ए,

दर्दमय ज़िन्दगी की निशानी है ए,

बस पलक मारते गोद सूना हुआ,

आह में उम्र भर सिर्फ़ रोना हुआ,

मिल न पाते कफ़न, हो न पाता दफ़न,

इन गरीबी वतन का है उजड़ा चमन,

ऐसे रंगीन युग का नज़ारा यहीं,

वैसे दुखियों का कोई सहारा नहीं,

इन्सां क्यों कर बना राज़ क्या है,

ग़म की…

है कहीं अन्न जकड़े हुए सड़ रहे,

भूखे जन एक दाने लिए लड़ रहे,

कुत्ते को दूध-रोटी सुहाता नहीं,

वो तो हलुवा-कचौड़ी भी खाता नहीं,

उन अमीरों का हर रात हर पल जवां,

बस सुरा सुंदरी का अनोखा समाँ,

वे क्या जाने गरीबी है कहते किसे,

हर घड़ी मौत मुँह बाये घेरे जिसे,

वो तो बैठे महल को सजाए हुए,

चाँदनी में दिवाली मनाए हुए,

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दुर्दशा

(1)

सदियों से बेख़्वाब रही स्त्रियों की ठिठकी, सिमटी, मसली-सी बदहाल ज़िन्दगियों में अनहद दुःख रहे हैं। सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स की दीवारों पर बिखरी टिप्पणियों और शेयरिंग्स से यह खुद-ब-खुद ज़ाहिर है कि जल-जलकर बुझ जाना ही औरतों का इतिहास रहा है।

यह कहानी है दुःख, दर्द, पीड़ा, अन्याय, संघर्ष और विवशता के अथाह सागर में तैरती-डूबती आर्तनाद करती एक आम नारी शकुंतला की। शकुंतला की कहानी बेबस, लाचार नारी की मूक-वेदना के क्रंदन की कहानी है। विधि ने मानो आँसू में कलम डुबोकर उसकी कथा लिखी थी।

शकुंतला की शादी मनोज से हुई थी। शादी क्या हुई, बेचारी का तो सुख-चैन ही समाप्त हो गया। मायके में जो आँखें गाँवों की सड़कों की तरह शाम होते ही बंद हो जाया करती थी, वे अब देर रात तक खुली रहती थीं। सबके सोने के बाद सोती थी और सबसे पहले जागती थी। दिनभर बगैर किसी शिकायत के लगनपूर्वक सारे काम करती थी। लेकिन पता नहीं किस चीज़ की कमी थी कि दिनभर ताने, अपमान, अनादर और छीछालेदर सहना पड़ता था। नाजों से पली फूल जैसी बच्ची पर विपत्तियों का पहाड़ टूट पड़ा था। चुपके-चुपके रोती थी लेकिन अपनी कहानी किसी से न कहती थी। यह कोई अचानक हो रही नई घटना थोड़े ही न थी। बचपन से ही उसने अपने आस-पास की विवाहित औरतों को अपमान का घूँट पीते देखा था। शादी से पहले तो कई बार उसे समझाया भी गया था कि ससुराल में कैसे रहना चाहिए। “औरत बंधन में ही अच्छी लगती है। उसे अपनी परिवार की मर्यादा का ध्यान रखना पड़ता है। वह मर्द थोड़े ही न है कि जो मन में आए, करे।”

सास-ननद उठते गाली और बैठते व्यंग्य से बातें करती थीं। कभी-कभी शकुंतला सोचती कि ये लोग भी तो कभी बहू रही होंगी या बनेंगी। लेकिन कभी कुछ बोल नहीं पाती। होठों में सिसकियाँ दबा लिया करती थी।

दरअसल ननदों की हालत कत्लखाने में रखी गई उस बकरी की तरह होती है जो तब तक चिंता नहीं करती, जब तक उसके अपने मरने की बारी न आ जाए।

जैसे-तैसे शकुंतला के दिन कट रहे थे। सोचती कि आज नहीं तो कल, दुःख के बादल तो छँटेंगे ही। समय के पाँव तो कभी उल्टे, कभी सीधे पड़ते रहते हैं। इसी आशा के साथ वह खुद काँटों पर सोकर बाकियों के लिए फूलों की सेज सजाती रही।

(2)

शादी के तीन साल बीत गए थे। अभी तक एक बार भी मायके न जाने दिया गया था। दूरी भी अधिक थी। इन तीन सालों में मायके वालों से कभी मिलना भी न हुआ था। हमेशा कोई-न-कोई बहाना बनाकर मुलाक़ात टाल दी जाती थी। नहीं-नहीं, लेन-देन की कोई समस्या न थी। दहेज तो पूरा दिया गया था। सारी माँगें पूरी की गई थी। दूर-दूर के गाँवों में आज भी उस शादी को याद किया जाता है। कहीं कोई कसर नहीं छोड़ा गया था। लेकिन अपने समाज में ससुराल वालों को बेवजह परेशान करने में पता नहीं क्या आनंद मिलता है! मायके वाले भी मजबूर होते हैं।

उस दिन पूरे तीन साल के बाद शकुंतला का छोटा भाई शिवम आया। घर ले जाने आया था। बहन से मोबाइल पर बात हो चुकी थी। सास-ससुर को इस बात की जानकारी नहीं थी। मनोज किसी काम से बाहर गया हुआ था। जब शिवम आया, तो उसे बैठने को भी न कहा गया। शकुंतला घर के अंदर थी। भाई को अपमानित करके वापस भेज दिया गया। इतने पर भी गुस्सा शांत न हुआ तो शकुंतला को सुना-सुनाकर सब उसके घरवालों के विषय में उल्टी-सीधी बातें करने लगे। मनोज आया, तो उसे भी बातों में मिर्च-मसाला लगाकर भड़का दिया गया।

शकुंतला अपने कमरे में फूट-फूटकर रो रही थी। जिस दुलारे भाई को तीन साल से राखी नहीं बाँधा था, आज वह घर के द्वार से ही बिना मिले अपमानित होकर लौट गया था। कोमल गुड़िया अब सारी सामाजिक मान्यताओं और मर्यादाओं से परे जाकर रण चंडी बन जाना चाहती थी। सहनशक्ति का बाँध टूट चुका था। सशक्त प्रतिवाद करने का जुनून सवार था। सोचती, “स्त्रियों की इस दुर्दशा के लिए खुद स्त्री भी कम दोषी नहीं है। स्त्रियों के बीच में अपने हक़ के लिए, अपनी सम्मान की रक्षा के लिए आवाज उठाने की प्रवृत्ति नहीं है। हम इस बदहाली को ईश्वरीय देन समझते हुए अपनी नियति मान बैठे हैं। यदि अभी नहीं बोली, तो बात बढ़ती चली जाएगी। उनकी घर की इज़्ज़त है, तो क्या मेरे घर की कोई इज़्ज़त नहीं है?”

आख़िरकार उसने आज तक मिली सारी दुःखों को याद किया, हिम्मत जुटाया और जाकर एक साँस में सास से बोल दिया, “माँजी, चाहे मुझे मार दो। जला दो। लेकिन मेरे बाप-भाई के बारे में कुछ गलत न कहो।”

घर के सारे लोग वही बैठे थे। नर्म गालों पर पति का एक ज़ोरदार तमाचा पड़ा। घर में चुप्पी सर्दी की धुंध-सी फैल गई, फिर और थोड़ा गहरा गई। घर अपने आप में सिमट गया। सब कुछ ठहर-सा गया। आज पहली बार परिवार की दीपशिखा जो डगमगाई थी!

अब इस घटना के बाद तो चाँदनी भी धूप थी। ज़िन्दगी नर्क बन गई। जली-कटी सुनने की तो आदत-सी हो गई। होठों से हँसी, माथे से खुशी और आँखों से आँसू खत्म हो गये थे। न हँस पाती थी, न रो पाती थी। ज़िन्दगी मानो किसी मज़ार की शमा बन चुकी थी। किसी को चिंता न रहती कि खाती-पीती है या नहीं, अच्छी है या बीमार, दुःखी है या सुखी।

दरअसल अब सेज का सिन्दूर भी अपना न रहा था। सदा एक धार में चलने की कसम खाने वाली किश्तियाँ अब बिछड़ चुकी थीं। पति के श्रव्य-भवन की खिड़कियाँ उसके लिए बंद हो चुकी थीं। जिस्म तो नज़दीक थे पर दिलों में काफ़ी दूरियाँ आ गई थी। सास-ससुर-ननद की अप्रसन्नता की तो उसे विशेष चिंता न थी। पति की एक मृदु मुसकान के लिए, एक मीठी बात के लिए उसका हृदय तड़प कर रह जाता था। चमड़ी और रक्त का ही बना पति अब सिर्फ़ उसकी चमड़ी को नोचता, उससे खेलता और फिर छोड़ देता। नित्य अवहेलना, तिरस्कार, उपेक्षा, अपमान सहते-सहते उसका चित्त संसार से विरक्त होता जाता था। दिन घिसटता जा रहा था। ज़िन्दगी रेंग रही थी। हर दिन, हर पल।

शादी के पूर्व जिस प्यार के स्वप्न पलकों में झूमा करते थे, उनकी अकालमृत्यु हो गई थी। अब न तो वह मनोज के साँसों की सरगम, धड़कन की वीणा और सपनों की गीतांजली रही थी और ना ही मनोज अब उसके उपवन का हिरण, मानस का हंस।

(3)

छुट्टी का दिन था। घर के सारे लोग बाहर गये हुए थे। किसी ने साथ चलने को पूछा तक न था। शकुंतला अकेली चुपचाप बैठी थी। समूचा बदन बुखार से तप रहा था। मन कई प्रश्नों और विचारों से घिरा हुआ था। सोच रही थी, “मैं अभागन हूँ, त्याज्य हूँ, कलमुंही हूँ। सिर्फ़ इसीलिए न कि परवश हूँ?”

उसे अब किसी चीज़ की लालसा न रही थी। जो सीता सोने के एक हिरण को देखकर व्याकुल हो गई थी, वह राम की गैर-मौजूदगी में सोने की पूरी लंका को भी देखना तक पसंद नहीं करती थी।

शकुंतला अपनी बदहाली पर रो रही थी। बहारों की पालकी लुट चुकी थी। सारी आशाऍ-आकांक्षाऍ मर चुकी थीं। अब तो सपनों की लाशों को कफ़न से ढॅक कर सिर्फ़ किस्मत के दिखाए तमाशों को देखना रह गया था। बीच-बीच में वह अपनी मानस-पटल पर अंकित बचपन की धुंधली खट्टी-मीठी स्मृतियों को टटोल रही थी। “बचपन कितना प्यारा था! पत्थर में प्राण जगा दे, ऐसी बच्ची थी वह। तब और अब में कितना अंतर आ गया है! अब तो इस जग-नदियाँ में अपनी नाव खेना बड़ा मुश्किल हो गया है।”

दरअसल स्त्री के लिए बचपन सावन के धूप की तरह होती है। जितनी चीज़ धूप में सूखानी हो, सूखा लो। शादी के रूप मे बारिश आती है और सब नाश हो जाता है।

शकुंतला सोचती, “स्त्रियों के लिए घृणा, निन्दा, हिंसा, चांडाली क्रोध, अंतः सारशून्य अहंकार- क्या यही सब हमारे समाज के इतिहास की समग्र फल-श्रुति नहीं है?” अब तो वह स्वयं भी इन समस्याओं को झेल चुकी थी।

यदि आँसुओं के धागे से दिल के ज़ख्म सिले जा सकते, तो शकुंतला के सारे कष्ट उसी क्षण मिट गए होते। सोचते-सोचते, रोते-रोते अचानक वह भावविहीन हो गई। मस्तिष्क बधिर हो गया। सूना होता हुआ, शून्य हो गया। साँस थक कर हार गई थी। शकुंतला मर चुकी थी। साथ में वह मासूम बच्चा भी, जो उसके कोख में पल रहा था। कहते है न कि शबनम की बूँदों तक पर निर्दयी धूप की कड़ी नज़र होती है।

(4)

मनोज की दूसरी शादी हो गई। एक दिन सास अपनी नई बहू से कह रही थी, “क्या महारानी जी, हमेशा आराम फरमाती रहोगी या कुछ काम भी करोगी? सपनों के हिंडोलों में मगन हो के झूलते रहने के लिए यहाँ नहीं आई हो। हाय राम, भगवान ने मेरी बेटी जैसी पहली बहू को इतनी जल्दी मुझसे छिन लिया!”

-साकेत बिहारी

शुरुआत

मेरा नाम साकेत बिहारी है। बिहार का रहनेवाला हूँ। आई.आई.टी. (बी.एच.यू.), वाराणसी में रासायनिक अभियांत्रिकी की पढाई कर रहा हूँ।

लिखने-पढने का बचपन से ही शौक रहा है। रचनात्मक लेखन के प्रति असीम प्रेम के कारण ही यह ब्लॉग शुरु कर रहा हूँ “बिहारी की दूसरी दुनिया” नाम से।

तो चलिए, शुरु करते है…