ख़त – The Lit Club—साहित्य सभा

आज तक इतने दिल से मैंने कभी नहीं लिखा था और शायद ही कभी लिख पाऊँ।✌🏼

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ख़्वाब की ऐसी-तैसी — The 🔥 Club

मेरा छोटा भाई सोनू कल मुझसे बार-बार मोहन के बारे में पूछ रहा था। वह जानना चाहता था कि हम दोनों दोस्तों की किश्तियाँ बिलकुल विपरीत क्यों चल रही हैं? मेरे यह बोलने पर कि वह भटक गया, अच्छा माहौल न मिला, सोनू बोलने लगा, ”यह तो कोई बात न हुई। कहानी में तो हमेशा […]

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दुर्दशा — The 🔥 Club

तीन-चार महीने पहले एक कहानी लेखन प्रतियोगिता में इसे लिखा था। आज हमारे साहित्य सभा के ब्लॉग पर आई।✌🏼

(1) सदियों से बेख़्वाब रही स्त्रियों की ठिठकी, सिमटी, मसली-सी बदहाल ज़िन्दगियों में अनहद दुःख रहे हैं। सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स की दीवारों पर बिखरी टिप्पणियों और शेयरिंग्स से यह खुद-ब-खुद ज़ाहिर है कि जल-जलकर बुझ जाना ही औरतों का इतिहास रहा है। यह कहानी है दुःख, दर्द, पीड़ा, अन्याय, संघर्ष और विवशता के अथाह […]

via दुर्दशा — The 🔥 Club

एक नया विहान

हमारे आई.आई.टी.(बी.एच.यू.) के साहित्य सभा ने अपना ब्लॉग शुरु किया है। अब मेरी बहुत सारी रचनाएँ यहाँ भी मिलेंगी। यह भी मेरी ही कलम की उपज है।

The 🔥 Club

बड़ी खुशी की बात है कि साहित्य सभा, आई.आई.टी.(बी.एच.यू.) ने अपना यह ब्लाॅग शुरु किया है।

हिन्दी और अंग्रेज़ी भाषाओं में कहानी, कविता, निबंध, साहित्यिक आलोचना, फिल्म समीक्षा, संस्मरण, यात्रा-वृतांत, इत्यादि के रूप में हमारी रोचिभूषित रचनाओं का हर वक्त आपको इंतज़ार रहे, यही इस ब्लॉग का हासिल होगा।

आपको हमारी सभा के अजस्र-शब्द-वृष्टि-निरत सारे साहित्यिक बंधु अलग-अलग प्रकार की रचनाओं की सौग़ात देते रहेंगे। हमारी रचनाओं में कभी परंपराओं के बंधन में बंधे रहने का संदेश मिलेगा, तो कभी परंपराओं की होलिका भी जलेगी। सामाजिक बंधनों और समाज के तक़ाज़ों से अप्रभावित अपनी मनमर्जी के जीवन की झलक मिलेगी। कभी शारदा के सितार और विष्णु के शंख की मधुरता दिखेगी, रति की सूरत और स्वर्ग की झाँकी की सुंदरता दिखेगी, गंगा के पानी और सावित्री के दामन की पवित्रता दिखेगी, तो कभी सपनों के खंडहर के ऊपर बेबस, लाचार, भटकती, टूटती, रोती ज़िन्दगी। कभी माशूक़ा के दिल का कुंदन…

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ख़्वाब

मेरा छोटा भाई सोनू कल मुझसे बार-बार मोहन के बारे में पूछ रहा था। वह जानना चाहता था कि हम दोनों दोस्तों की कश्तियाँ बिलकुल विपरीत क्यों चल रही है। मेरे यह बोलने पर कि वह भटक गया, अच्छा माहौल न मिला, सोनू बोलने लगा, ”यह तो कोई बात न हुई। कहानी में तो हमेशा कोई ख़ास बात होती है।” मेरे मन के भीतर भी एक कहानीकार बेचैन-सा करवटें ले रहा था। मेरे मानस-पटल पर मोहन की धुंधली खट्टी-मीठी स्मृतियाँ बिलकुल स्पष्ट नज़र आने लगी। सोचने लगा कि यदि सधी राह होती, सधा ख़्वाब होता, उफनती नदी-सा जज़्बात न होता तो आज शायद वह ज़िंदगी के इस मोड़ पर खड़ा न होता।

मोहन पहले ऐसा न था। बचपन में मुझे हमेशा यूँ ही लगता था कि उसका मन गंगा के ढाल-सा होगा। हमेशा साफ़, भरा और छलछलाता हुआ। चाहे कितना ही सूखा क्यों न आ जाऍ, पर मन में स्नेह का स्त्रोत हमेशा लबालब भरा हुआ रहेगा। लेकिन आज उसके अंदर इतना टेढापन पैदा हो गया है कि उसकी नज़र में मोहब्बत मोहब्बत न रही, रिश्ते रिश्ते न रहे, जीवन जीवन न रहा। सबकुछ एक मज़ाक बनकर रह गया है। वह मनोविकारों का मानो एक गुलदस्ता बन गया है।

मुझमें और मोहन में सबसे बड़ा अंतर यह था कि मैं समय की दौड़ से कदम मिलाने में अपने ख़्वाब छोटे करता चला गया। मोहन मुझसे कहा करता, “तुम बहुत डरपोक हो जो तुमने अपने ख़्वाबों के अध-लिखे पन्ने फाड़कर फ्लश-आउट कर दिए”। वह हक़ीक़त से दूर भागता रहा। ख़्वाब देखता रहा। हर मिट्टी के चंदन और हर बगिया के नंदन हो जाने का ख़्वाब। छलकती आँखों को वीणा थमाने का ख़्वाब, सिसकती साँसों को कोयल बनाने का ख़्वाब।

अंततः सारे ख़्वाब अविवाहित ही मर गये क्योंकि ख़्वाब देखने से हक़ीक़त बदलती नहीं, बस धुंधला जाती है और जब ख़्वाब के दरवाजे और खिड़कियाँ बंद करनी पड़ जाती है, तो बड़ा दुःख होता है। मिर्च से तेज़ लगता है जलेबी का चाँटा। जब बंद पड़े-पड़े ख़्वाबों में बड़े सोर पैदा हो जाते हैं, कुंठाऍ पनप जाती है तो जीना भी मुश्किल लगने लगता है। कई बार तो हक़ीक़त में मिल रहे दुःख जीवन की जिजीविषा से भी बड़े हो जाते हैं।

नई उमर की चुनरी हो या कमरी फटी-पुरानी हो, मैं सबसे यही कहना चाहता हूँ कि यदि आपके मन की कुटिया में भी इठलाती हुई, बलखाती हुई, चुपचाप कहीं से कोई ख़्वाब आऍ तो उसमें खो न जाऍ क्योंकि आज नहीं तो कल, ये बादल बिखर जाएंगे।

मैं जानता हूँ कि सफ़र लंबा है और हक़ीक़त कड़वी है। ऐसे में कभी-कभी सच्चाईयों से नावाक़िफ़ रहना और बस परछाईयों से खुद को बहलाते रहने अच्छा लगता है। लेकिन हम अनजाने में चाँद की परछाईयों को पाने की तमन्ना में अपने अंदर की रौशनी के दीप बुझाते चले जाते हैं। ठीक उसी तरह जैसे अपने देश में कुछ अंग्रेजी पढी-लिखी स्त्रियाँ अपनी महान सांस्कृतिक विरासत को भुलाकर अर्धनग्न रहना अपना अधिकार समझने लगती हैं।

एक हसीन ख़्वाब और ढेर सारे ख़्याल, उनसे जुड़ी हमारी आशा, न पूरी होने का डर। आख़िर क्यों हम बस इन्हीं बातों में फँसकर रह जाते हैं? यदि अभी भी आपको इस ‘क्यों’ का जवाब नहीं मिला है तो जी, दुनिया में ऐसे बहुत-से ‘क्यों’ हैं जिनका हमारे पास कोई जवाब नहीं है।

-साकेत बिहारी

धन्यवाद ज्ञापन

यह धन्यवाद ज्ञापन करना मेरा सौभाग्य है।

मैंने 24 फरवरी 2018 को अपनी पहली कहानी “दुर्दशा” पोस्ट किया था। इतने कम समय में इतने पाठकों तक पहुँच जाना निश्चित रूप से खुशी की बात है।

मैं आख़िर क्यों लिखता हूँ? लिखने की आदत, अपनी एक अलग पहचान बनाने की चाहत या किसी दिन वक्त बदलने की आशा? शायद कोई जवाब नहीं है, इसलिए लिखता हूँ।
दरअसल क्या लिखता हूँ-पता नहीं, क्यों लिखता हूँ-पता नहीं। बस हाथ चलते जाते हैं, वक्त बीतता जाता है और शब्द बुनता जाता है। किसी की प्रशंसा मिल गई, तो खुश हो जाता हूँ। किसी प्रतियोगिता में हार गया, तो अपना क्या जाता है!

लिखता हूँ यह देखकर कि यहाँ तो हर कोई लिखता है। तब मेरे अंदर एक प्रतिस्पर्धा जन्म लेती है। फिर मैं भी अपनी कला का ढोल पीटता हूँ ताकि लोगों के दिमाग में भर सकूँ ये बात कि यार, मैं भी एक लेखक हूँ।

मुझे पूर्ण विश्वास है कि आगे और अच्छी-अच्छी रचनाएँ आप सब साहित्यिक बंधुओं के सम्मुख पेश कर पाऊंगा।

बहुत-बहुत धन्यवाद!

पानी का रंग

पानी अनमोल है। जीवनदायी है। अनिवार्य है। सहारा है। लेकिन विचित्र है। विस्मयकारी है।

कभी-कभी तो मैं बेचैन होकर यह सोचने को विवश हो जाता हूँ कि पानी का रंग क्या है! लोग कहते हैं कि यह रंगहीन है। क्या वाकई यह रंगहीन है?

मुझे तो इस रंगहीन कहे जाने वाले पदार्थ में अनेक रंग नज़र आते हैं। भाँति-भाँति प्रकार के रंग। खुद में इंद्रधनुषी छटा समेटे पानी और इसका रंग मुझे बड़ा अनोखा प्रतीत होता है। मैं हमेशा इनसे कुछ सीखने का प्रयास करता हूँ और सौभाग्यवश कभी निराश नहीं होता। किंकर्तव्यविमूढ़ता के क्षणों में ये रंग ही मेरा मार्गदर्शन करते हैं।

आख़िर कैसे रंग?

पानी रे पानी तेरा रंग कैसा?

पानी में मुझे हरदम हरपल नए-नए रंग नज़र आते हैं। ये बदलते रहते हैं। ये हमें समय के साथ बदलते रहना सीखाते हैं। पानी भूखे-नंगों के लिए सबसे बड़ा सहारा है। संसार में नित करोड़ों लोग सिर्फ़ पानी पीकर सो जाते हैं। प्यास के पलों में हम इसकी एक बूंद के लिए कुछ भी न्योछावर करने को तैयार हो सकते हैं। यह सहारा है। अमूल्य है।

पानी रे पानी तेरा रंग कैसा?

भूखे की भूख और प्यास जैसा।

पानी जब गंगा से मिल जाता है तो यह गंगाजल अमृत बन जाता है। मानव जाति को मोक्ष का रास्ता दिखाता है। हम उसे अपने घरों में पवित्र अनुष्ठानों में प्रयोग करते हैं। शुद्ध होते हैं। यही पानी जब बादल से मिल जाता है, तो हमें रिमझिम बरस रहे सावन की सौगात देता है। उस वक्त यह बड़ा मनोहारी लगता है। मोर नाचने लगते हैं। फसल लहलहा उठते हैं। प्रेमी युगल भाव विभोर हो जाते हैं। समूचा संसार आनंद के सागर में गोता खाता प्रतीत होता है।

लेकिन यही पानी जब हमारी छतों से टपकता है, तो हमारा जीना हराम हो जाता है। हम इसे कोसने लगते हैं। यह जब बाढ के रूप में, सूनामी के रूप में हमारे सामने आता है, तो हम त्राहि-त्राहि करने लग जाते हैं। चहुँओर हाहाकार मच जाता है।

पानी रे पानी तेरा रंग कैसा?

दुनिया बनाने वाले रब जैसा!

पानी के न जाने कितने रूप हैं। कभी सहारा है, तो कभी आपदा। कभी जीवन देता है, तो कभी जीवन छिनता है। कभी खुशी देता है, तो कभी दुख। कभी अच्छा लगता है, तो कभी बुरा। कभी हम इसके बेहद करीब जाना चाहते हैं, तो कभी दूर भागते हैं।

हर क्षण मुझे यह नए रंग-रूप में दिखाई देता है। अदना-सा यह अबोध बालक तो कभी इसके रंग को नहीं समझ सकता। लेकिन इसके हर रंग को मैं एक नए उत्साह से देखता हूँ। समय और स्थान के साथ इसके बदलते रंग को देखकर चकित होता हूँ और सोचता हूँ कि मुझे भी ऐसा ही बनना चाहिए। कभी एक रंग में सीमित न रह जाना चाहिए। बदलाव को सहजता से स्वीकार करना चाहिए।

पानी रे पानी तेरा रंग कैसा?

जिसमें मिला दो लगे उस जैसा।

आखिर मैं पानी की तरह क्यों बनना चाहता हूँ? क्या समय के साथ बदलना जरूरी है? यदि हाँ, तो क्यों?

समय के साथ बदलते हुए मूल्यों के फलस्वरूप समाज और परिवार के जिस माहौल में हम रह रहे हैं, उस रोचक परिवेश में हमारा भी नित बदलते रहना समय की मांग है। जब बाल्यावस्था पार कर मैंने धीरे-धीरे कैशोर्य का स्पर्श किया, तो मुझे ये दुनिया अचानक कुछ अजनबी-सी लगने लगी। मैं परेशान हो गया। तब पानी के रंग ने मुझे चलते समय के साथ बदलना सीखाया। कभी-कभी जब उल्लास और उदासी की घटनाएँ अकस्मात घटित हो जाती है और मेरे मन में तरह-तरह के प्रश्न उठने लगते हैं, तो मैं उन सवालों का जवाब ढूंढे बगैर समय के साथ बदलना अधिक अच्छा समझता हूं।

दरअसल यह दुनिया बड़ी रोचक है। थोड़ी अजीब। समझ से परे।

यदि हम दुनिया के साथ नहीं बदलेंगे, तो दुनिया हमें पीछे छोड़कर अपने रास्ते पर निकल पड़ेगी। हमारा इंतज़ार नहीं करेगी। हम तन्हा हो जाएंगे और भाई, तन्हाई बड़ी ज़ालिम होती है।

दुनिया भाग रही है, लोग भाग रहे हैं, समय भाग रहा है। हमें भी भागना होगा, ताल-से-ताल मिलाए रखने के लिए। हमारे पास यह सोचने के लिए बिलकुल भी समय नहीं है कि हम क्यों भागे! क्यों बदले? बस बदलते रहना है, पानी की तरह। जिस परिवेश में हो, उसके अनुरूप ही चोला पहन लेना है। बगैर किसी झिझक के।

लेकिन क्या पानी का रंग सिर्फ़ माहौल के साथ बदलना सीखाता है? नहीं। यह हमें कुछ और भी सीखाता है, जो बेहद प्यारी है। सबसे महत्वपूर्ण है।

पानी जिस तरह से अनेक रंगों में होने के बावजूद अपनी रंगहीनता नहीं छोड़ता, वह हमें अपना धर्म बरकरार रखना सीखाता है। पवित्रता बनाए रखने का संदेश देता है।

हम समय, माहौल और उम्र के साथ चाहे कितने भी क्यों न बदल जाएँ, अपने ‘स्व’ को कभी नहीं खोना चाहिए। वही हमारी वास्तविक पहचान है। उसके बगैर हमारा कोई मोल नहीं है।

यह सच है कि ज़िंदगी के इस रोचक सफर में कभी-कभी हमें अपनी वास्तविक पहचान को भूलकर चाहे-अनचाहे थोड़ा बदलना पड़ता है, लेकिन वह बदलाव शाश्वत नहीं होनी चाहिए। हमारे अंदर का बचपना, हमारे गुण-दुर्गुण, हमारी पसंद-नापसंद, हमारे रिश्ते-नाते ही हमारी वास्तविक पहचान है। इन्हें गुमनामी के अंधेरे में धकेल देना कभी उचित नहीं होगा। हम इन बहुमूल्य बातों का मोल देकर बदलावों को स्वीकार नहीं कर सकते।

तो इस प्रकार रंगहीन पानी के अनंत रंग हमें समय के साथ बदलना और बदलावों के बावजूद अपनी वास्तविकता बरकरार रखना सीखाते हैं। संक्षेप में, यह हमें ज़िंदगी का फ़लसफ़ा सीखाता है। जीना सीखाता है। इस छद्मवेशी दुनिया को उसके ही रूप में स्वीकारना सीखाता है।

-साकेत बिहारी